कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २२६ )
कबहुँ कहै प्रभुने सब कीन्ह। कबहुँ कहत सब मोर अधीना॥ स्वारथ रूप सदा चित लावै । परमारथ कबहुँ नहि भावै ॥
साखी-कहै कवीर धर्मदास सों, तुम सुनियो चितलाय । काल भेद नहि जानहीं, मूरख रहे खुलाय ॥
चौपाई
जो देखा सो काल पसारा । जो बिनसे सो काल अहारा ॥ धर्मदास तुमचित थिर करहू । मनकी डगमग तब परिहरहू ॥ भूत भविष्य वर्तमान जो कहिये । यहि बिधि तीनकाल निर्वहिये ॥ भूत सबै है कालकी काया । भविष्य होय सोइ जीव कहाया ॥ वर्तमान परमात्म जानो । यहि विधितीनकाल पहिचानो ॥ जोई भूत सोई वर्तमाना । सोई भविष्यत भर्मकर जाना ॥ भूत भविष्यत और वर्तमाना । मनथिर भए सबै पहिचाना ॥ शब्द मांहि हंसा निरबहई । मन बिच कर्म नामको गहई ॥ मनके रूप समानी माया । सब संसार व्याप्त यह छाया ॥ मन थिर कर परमात्म जाना । यह विधि तत्त्व लेहुपहिचाना ॥ काल जाल तैं तेही लूटै । काल बिचारै ताहि न लूटै ॥ यही भेद धर्मन सुन लीजै । शब्द मांहि बासा तुम कीजै ॥ काल ज्ञान संसार बखाना । काल स्वरूप नहीं पहिचाना ॥
साखी-इतना भेद सुन लीजिये, काल को ज्ञान बखान । काल पाय कर होत है, हम सों फिर फिर ज्ञान ॥
धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास तब पांयन परई । सतगुरु सों बिन्ती अनुसरई ॥ जो तुम कही सोई परवाना । काल पाय कर फिर २ ज्ञाना ॥ तुम प्रसाद मुक्ति फल पावा । यह भवसागर बहुर न आवा ॥ हम सों ज्ञान कहा फिर होही । सोई बात कहो निज मोही ॥