कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1099, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २३१ )
धर्मदास वचन
अर्ज एक अब सुनो हमारी । तुम गुरु लीन्हा जीव उबारी॥ शोध देख हम सकल शरीरू । पीरा मेटौ बाप कबीरू ॥ केते लाख चूक जो परई । किहि कारण नरिअर अनुसरई॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास तुम सुनो ये बाणी । ताकर भेद कहौं परवानी ॥ सवा लाख चूक जो परई । तिहि कारण नरिअर अनुसरई॥ बहुत भांति सों तत्व लगावै । मृत्युलोकमें बहुरि न आवै ॥
सुमिरन नरिअर तिलकको
मृत्यु लोक यम को स्थाना । खैंच कबीर ने मारा बाना ॥ बान मार जत यश लीन्हा । तिलक काढ़ धर्मन कहै दीन्हा॥
साखी-पाक नारिअर मोरके, हंस उतारो पार ।
कंचन कपूर मिलगए, साहिब जीवको करौ उधार॥
खिरचा अचवन लेके, यकटक सुमरौ ध्यान ।
कहै कबीर धर्मदाससों, सोहे शब्द प्रधान ॥
सम्पूर्ण
चौपाई
तबही दीपक आन प्रकाशा । मनो सत्य लोक कियो बासा॥
अन्न शब्द का पावै भेदा । कहे कबीर तब जोत अछेदा॥
तबहि पानका लिखनी नीका । अन्न शब्दका पावे टीका ॥
सत्यका अंक तहाँ लिख दीन्हा । मंत्र उचार एक तब कीन्हा ॥
सुख सागर मोरौ स्थाना । तहँवा सेत चढ़ाये पाना ॥
सेत पानका अम्बर काया । सीपमाँहिं जिम स्वाति समाया॥
भर्मत पवन बिहरत संसारा । निर्मल पवन हंस रखवारा ॥
तबहि तिनका बेग तुरावा । जन्म जन्मके पाप बहावा ॥