भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( २३१ )

धर्मदास वचन

अर्ज एक अब सुनो हमारी । तुम गुरु लीन्हा जीव उबारी॥ शोध देख हम सकल शरीरू । पीरा मेटौ बाप कबीरू ॥ केते लाख चूक जो परई । किहि कारण नरिअर अनुसरई॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास तुम सुनो ये बाणी । ताकर भेद कहौं परवानी ॥ सवा लाख चूक जो परई । तिहि कारण नरिअर अनुसरई॥ बहुत भांति सों तत्व लगावै । मृत्युलोकमें बहुरि न आवै ॥

सुमिरन नरिअर तिलकको

मृत्यु लोक यम को स्थाना । खैंच कबीर ने मारा बाना ॥ बान मार जत यश लीन्हा । तिलक काढ़ धर्मन कहै दीन्हा॥

साखी-पाक नारिअर मोरके, हंस उतारो पार ।

कंचन कपूर मिलगए, साहिब जीवको करौ उधार॥

खिरचा अचवन लेके, यकटक सुमरौ ध्यान ।

कहै कबीर धर्मदाससों, सोहे शब्द प्रधान ॥

सम्पूर्ण

चौपाई

तबही दीपक आन प्रकाशा । मनो सत्य लोक कियो बासा॥

अन्न शब्द का पावै भेदा । कहे कबीर तब जोत अछेदा॥

तबहि पानका लिखनी नीका । अन्न शब्दका पावे टीका ॥

सत्यका अंक तहाँ लिख दीन्हा । मंत्र उचार एक तब कीन्हा ॥

सुख सागर मोरौ स्थाना । तहँवा सेत चढ़ाये पाना ॥

सेत पानका अम्बर काया । सीपमाँहिं जिम स्वाति समाया॥

भर्मत पवन बिहरत संसारा । निर्मल पवन हंस रखवारा ॥

तबहि तिनका बेग तुरावा । जन्म जन्मके पाप बहावा ॥