कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २३५ )
फागुन और भादों परवाना । दो आरति नहीं छोड़ सुजाना ॥ साधन को परवाना देई । वर्ष रोज के कर्म नसाई ॥
साखी-पान प्रवाना पावही, सतगुरु महिमा दान । तबही हंसा सत्य है, और झूठ सब ज्ञान ॥
चौपाई
धर्मदास में तुमहिं सुनाऊं । आरति भेद ज्ञान समझाऊ ॥ अक्षर सार आरती सोई । बिन अक्षर सब गए बिगोई ॥ अक्षर भेद जान परसंगा । ताके काल रहै नहीं संगा ॥ आरति बहुत भांति सो करई । अक्षर भेद हिये नहीं धरई ॥
साखी-अक्षर भेद जाने नहीं, बातें कहै बनाय । ताको कहौ न मानिये, आपन जीव नशाय ॥
चौपाई
आरति भक्ति औ अक्षर सारा । और सकल सब झूठ पसारा ॥ जा कहैं अक्षर परिचय होई । आरति फल पावत है सोई ॥ मूल शब्द घट मांहि विराजै । शून्य शिखर अक्षर धुन साजै ॥ ताकी महिमा तुलै न कोई । ऐसा साधू विरला होई ॥ सो कडिहार जो अक्षर जाना । और गुरु सब झूठ बखाना ॥ गुरु सोई जो अक्षर जाना । बिन अक्षर मूरखसम जाना ॥ कडिहार वही जीवन कहैं तारै । अक्षर बिन जिव नरकहि डारै ॥ जो गुरु दगा शिष्य कहैं देता । नरक परै गुरु शिष्य समेता ॥ अक्षर बिन गुरु आरति करई । धर्मराय के फन्दा परई ॥ इतना भेद न जानत प्रानी । पेटके कारण ज्ञान बखानी ॥ जैसे ठनिया करै ठगिहारी । जैसे जानहु सो कडिहारी ॥ अक्षर की परिचय नहीं पावे । आपहि आप जो गुरु कहावे ॥