कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २३७ )
ज्ञान शब्द घट मांहि समाना । सो पावेगा पद निर्वाना ॥ माथे तिलक गले जयमाला । हिय पाखंड न मिले गुपाला ॥
साखी—कहैं कबीर विचारके, सुनियो हो धर्मदास । सत्य शब्द जिहिं घट बसे, तहैं पाखंड विनास ॥
चौपाई
धर्मदास तुम सत्त कै जानहु । पाखण्ड भर्म हृदयमत आनहु ॥ जाको मन पाखंड सों राता । सोई नरक कहैं निश्चय जाता ॥ पाखंड हिये भक्ति ना होई । सत्य वचन मानो घट सोई ॥ दान देय औ पूजा करई । पाखंड धर्म जीव नहिं तरई ॥ योग यज्ञ तीरथ फिर आवे । पाखंडी जिव ठौर न पावै ॥ धर्मदास निश्चय सुन लीजे । सत्य शब्द में वासा कीजे ॥
साखी—धर्मदास सुन लीजिये, सत्य शब्द उपदेश । बिना सत्य पहुँचे नहीं, सत्य लोक निज देश ॥
चौपाई
सत्य शब्द सतपुरुषहि जानौ । नाम बिना सब झूठ बखानौ ॥ नाम छोड़ नहिं औरहि जानौ । निर्गुण सर्गुण एकहि मानौ ॥ निर्गुण सर्गुणतैं नाम नियारा । जो चीन्हें सो हंस हमारा ॥ जहैं देखे तहैं शब्द स्वरूपा । बोलन हारको अचरण रूपा ॥ अचरज बात कहन की नाही । बिन सतगुरु नहिं पावै थाहीं ॥
साखी—निह अक्षर निज पावही, मिटि है सकल अँदेश । निह अक्षर जाने बिना, घटही में परदेश ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास बिनती अनुसार । अर्ज एक सुनिये करतारा ॥ सकल भेद गुरु मोहि बतावा । बिना ज्ञान भेद नहिं पावा ॥