भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बाधसागर

( २४१ )

जप तप माया कीन्ह खुआरा । ऐसे जीव अटक यमद्वारा ॥ पारसनाथ पूजा मन लाई । बहुत भाँति सों पूजहि जाई ॥ पारसनाथ परम गुरु ज्ञानी । ताकी नहिं पावैं सहदानी ॥ ताके कर्म काट सब जाई । सतगुरु चरण रहै लवलार्ई ॥ जब सतगुरु की दाया होई । अक्षर भेद पाय नहिं सोई ॥ ब्राह्मण क्षत्री वैश्य बखाना । अक्षर भेद नहीं पहिचाना ॥

साखी—अक्षर भेद जानैं नहीं, करे बहुत अभिमान । वैश्य सबै वे नष्ट हैं, सत्य वचन परमान ॥

चौपाई

चार वर्णमें शूद्र अधीना । सेवा कर सबसों लवलीना ॥ इतनी भक्ति सतगुरु की पाई । चार वर्णमहैं सो अधिकाई ॥ ब्राह्मणकी सेवा अनुसारे । काम कोध औ लोभ निवारै ॥ क्षत्री सों बहु करै मितार्ई । नित नये प्रेमसहित अधिकाई ॥ वैश्य धर्मही विधि कर पूजे । सत्य धर्म दाया चित कीजे ॥ ऐसे शूद्रहि ब्रह्म बखाना । ब्रह्मलोक में सेवा माना ॥ कलियुग शूद्र धर्म अधिकारा । तीन धर्म को भयो सँहारा ॥ धन्य शूद्र जो सेवा करई । गुरुके चरण हृदय महैं धरई ॥

साखी—यह तौ करनी शूद्रकी, सुनियो हो धर्मदास । सतगुरुके चरण जो सेवई, सत्य लोक महैं वास ॥

चौपाई

धर्मदास तुम शूद्र औतारा । जाते सतगुरु भक्ति चित धारा ॥ तुम्हरे पीछे ब्राह्मण तरि हैं । तुम्हरे पीछे क्षत्रि उबरि हैं ॥ चारों वर्ण मुक्ति घर जैहैं । जो तुम्हरो चरणोदक लैहैं ॥ कबहैं न जल आवैं तेई । मुक्ति पदार्थ पावैं जेई ॥

नं. ७ कबीरसागर - ९

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