कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २४६ )
तुमहि कही अस बस्तु गुसाईं । मैं बूझों यह संशय जाईं ॥ तुम्हरी दया आज जो पाऊं । तौ सब बालक लोक पठाऊं ॥
सद्गुरु वचन
तब साहिब अस कहि समुझाईं । बिना नाम नहीं लोक पठाईं ॥ नाँद बिन्दकै बालक दोईं । बिना नाम कोई मुक्ति न होईं ॥ के तौ पढ़ै गुणै औ गावै । बिना नाम भव भटका खावै ॥ हमरे माया मोह न होईं । सब संसार सत्य कर सोईं ॥ धर्मदास तुम बड़े हो ज्ञानी । यह संशय कस मन मँहै आनी ॥ गुरु को भार सबन कर होईं । तुम मनमें पछताव न कोई ॥ तारन तरन सत्य हम सोईं । बिन सतगुरु बूझा सब कोई ॥ सतगुरु तौ सब सृष्टि उबारा । तुम बालक अब कौन है भारा ॥ तुम जिन चिन्तामन मँहै करहूँ । सद्गुरु नाम हृदय मँहै धरहूँ ॥ एक काल आवे जब भाईं । सबै सृष्टि यह लोक सिधाईं ॥ जहाँ लग जीव जन्तु सब कहिये । तहाँ लग सब सद्गुरु मँहै लहिये ॥ सबै भार सद्गुरुके काँधे । पार लगावहि यम नहीं बाँधे ॥ यमका अमल छूट जब जाईं । सद्गुरु शरण जीव जब आईं ॥
साखी—कहे कबीर बिचारकै, सुनियो हो धर्मदास ।
अमरमूल जो जान है, ताको सब परकाश ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास बिनवै कर जोरी । स्वामी सुनिये बिनती मोरी ॥ तुम्हरे कहे जगत तर जाईं । कौन मतासों लोक सिधाईं ॥ ज्ञान दिव्य जो घट नहीं होईं । सोइ कवन बिधि लोकसमोईं ॥ तब मैं जानो ज्ञान तुम्हारा । सकल सृष्टिको होय उबारा ॥