भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( २४७ )

सद्गुरु वचन

तब साहिब बोले बिहसाई । अब यह ज्ञान सुनौ मन लाई॥ जब नहिं हते शून्य बे शून्या । तब नहिं हते पाप औ पुन्या॥ तब नहिं धरती गगन अकाशा । मेरे मन्दर नाहीं कैलाशा ॥ तब नहिं चन्द्र सूर्य औतारा । तब नहिं शेष सकलविस्तारा॥ तब नहिं इन्द्र कुबेर समोई । वायु वरुण तहैंवां नहिं कोई ॥ सात वार पन्द्रह तिथि नाहीं । आदि अंत नहिं कालकी छाहीं॥ तब नहिं ब्रह्मा विष्णु महेशा । आदि भवानी गौरि गणेशा॥ आदि पुरुष तब हते अकेला । उनके संग हता नहिं चेला ॥ आप पुरुष अस कीन्हौ साजा । शब्दहि माहि लोक उपराजा॥ प्रथमहि शब्द सुरत अनुसारा । तेहि पीछे सब द्रौप सवौरा ॥ तेहि पीछे पुन मूल बनावा । तेहि पीछे सोहं उपजावा ॥ ता पीछे अचिन्त जो कीन्हा । ते पीछे अक्षर रच लीन्हा ॥ ता पीछे कूर्महि निर्मयऊ । ताहि भार पृथ्वीको दयऊ ॥ तब जल रंग सूरत इस भाखा । सप्त पातालके नीचे राखा ॥ जिह्वितै भयो जलको विस्तारा । सकल सृष्टि कौ भयो पसारा॥ तिहि तैं तेज तत्त्व अनुसार । जेहिं गुण तैं काल औतारा ॥ पांच तत्त्वतैं सब निर्मावा । तीनों गुण तिहि माहि समावा॥ तीनों गुण स्वरूपके धामा । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर नामा ॥ रज गुण तैं ब्रह्मा उत्पानी । सतगुरु भाव विष्णु कर जानी॥ तमगुण शिव संहार पसारा । इतने भयो सकल संसारा ॥ तेजके गुणहि काल उत्पानी । तासों भये जीव दुखदानी ॥ तातैं पुरुष दया चित आई । हंसन कारण मोहिं पठाई ॥ यातैं मृत्यु लोकहि आए । धर्मदास तुम दर्शन पाए ॥ तुम जीवनकैं बन्द बुझाये । सुमरन सत्य नाम समुझाये ॥