कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २५१ )
ता मई पांच डार निर्मावा । आकाशादि तेज उपजावा ॥ प्रथमहि वायु रूप जो कीन्हा । वायुके मध्य तेज धर दीन्हा ॥ तेजके मध्य नीर निर्माया । जैसे बीजसे वृक्ष जमाया ॥ ऐसे उत्पति सबकी होई । धोकामें सब गये बिगोई ॥ सद्गुरु जा कहँ दाया कीन्हा । सकल भेद ते पावैं चीन्हा ॥ तत्त्व मांहि निहतत्त्व लखावै । हृद मांहि अनहृद कहँ पावै ॥ अनर्थ मेटके अर्थ बतावै । लघु दीरघ पूरा समझावै ॥ पूर्णज्ञान जाही घट होई । सतगुरु भेदको पावै सोई ॥ ब्रह्मज्ञान बिन मुक्ति न होई । कैसे संत कहावै सोई ॥ जाकी महिमा कही न जाई । ज्ञान गम्य तैं शब्दहि पाई ॥ शब्द सार निर्मोलक पावैं । सो हंसा सतलोक सिधावैं ॥
सारखी-सो पहुँचे सतलोक कहँ, काल मर्म नहि जान । ते हंसा अवरन भये, सत्यपुरुषके ध्यान ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास कहै सुनौ गुसाई । आप अपन पर सब बिसराई ॥ सतगुरु जापै दाया कीन्हा । तिन पायोनिजबिजको चीन्हा ॥ सूक्ष्म रूप परश जन आवै । लघुता विलै दीर्घ पद पावै ॥ लघुता मति प्रभु आवस कैसे । समझ परै घट कहिये तैसे ॥
सद्गुरु वचन
कहँ कबीर सुन सुकृती बानी । यह घट समझ लेहु सहिदानी ॥ सूक्ष्म रूप शब्द कर आही । सतगुरुमिलहिं लखावहिंताही ॥ सूरत नित जब शब्द समाना । अहंकार मन केर बिलाना ॥ दीन भाव गति तबही आई । सब घट आतम एक समाई ॥ पूर्ण ज्ञान जाहि घट होई । तब यह भेद पाय है सोई ॥ ज्ञानी महिमा एही जाना । सब घट आतम एक समाना ॥ सो हंसा सतलोक सिधावे । दुबिधा भाव सबै बिसरावे ॥