भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( २५९ )

तुमही शिष्य गुरु हो सोईं । तुम गुरुही शिष्य सब कोई ॥ गुरु अरु शिष्य एककर जाना । दूजा भाव सो सबै बिलाना ॥ दूजा भाव वसत है जाके । नहीं शिष्य नाही गुरु ताके ॥

साखी-गुरु शिष्यकी महिमा, कहैं कबीर विचार । अमरमूल जो जान हो, उत्तरो भौजल पार ॥

चौपाई

तुम कहैं शब्द दीन्ह टकसारा । सो हंसन सों कहो पुकारा ॥ शब्द सार का सुन्न करिहैं । सहजै सत्यलोक निस्तरिहैं ॥ सुन्न का बल ऐसा होई । कर्म काट सब पलमहैं खोई ॥ जाके कर्म काट सब डारा । दिव्य ज्ञान सहजै उजियारा ॥ जा कहैं दिव्यज्ञान परकाशा । आपहिमें सब लोक निवासा ॥ लोक अलोक शब्द हैं भाई । जिन जाना तिन संशय जाई ॥ तत्त्व सार सुन्न है भाई । जातें यमकी तपन बुझाई ॥ सुन्न सों सब कर्म बिनाशा । सुन्न सों दिव्यज्ञान प्रकाशा ॥ सुन्न सो जैहै सतलौका । सुन्न सों मिटे हैं सब धोका ॥ धर्मन सुन्न देहु लखाई । जासों हंस सबै मुकाई ॥ गुरु धोबी सिख कपड़ा जानी । सुन्न साबुन है परवानी ॥ बस्तर को तब मैल नसाई । तैसे ज्ञान हिये दसाई ॥ ह्दे ज्ञान परकट जब होई । कर्म भर्म सब मिटगए दोई ॥ ज्ञान दीप जबही परकाशा । मोहे तिमिरको भयो विनाशा ॥ सत्य पुरुष महैं जाय समाना । हंस पुरुष एकहि कर जाना ॥ दुतिया धोखा मिट तब गयऊ । एक रूप महैं एकसम एऊ ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिन्ती अनुसारि । हे सतगुरु तुम्हरी बलहारी ॥ एक बात अब बूझौ साई । जिहितैं मनकी संशय जाई ॥