कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २६१ )
साखी-जौ कछु गिन्ती आवही, ताकौ है सब नाश । परे न गिन किम गीनिये, ऐसा शब्द प्रकाश ॥
चौपाई
वचन भेद कर कथा सुनावा । जिह्तिं तुम्हरा मनपति आवा ॥ ब्रह्म अखण्ड लेख किमि जानी । खंडित कर किमि ज्ञान बखानी ॥ तहँ लगि सुनी सो माया जानी । जो देखा सो भर्म बखानी ॥ कहिये जो तौ दुतिया होई । दुनिया भर्म मेंट सब कोई ॥ एक ब्रह्म दुतिया नहिं कोई । कैसे दुतिया कहिये सोई ॥
साखी-नहिं उत्पति नहिं प्रलय, नहिं आवे नहिं जाय । नहिं गिन्ती अनगिनत वह, बूझ कै शब्द समाय ॥
चौपाई
तब हम आगे दीन्ह पयाना । जहँ देखा तहँ हंस समाना ॥ अक्षर एक हम सब में देखा । भाव अनेक कहो का लेखा ॥ तब हम चले आप स्थाना । ऊर्ध्वलोक सो कीन्ह पयाना ॥ मारगमें अचरज एक देखा । ताका अब मैं कहौं बिवेका ॥ अद्भुत लीला वर्णि न जाई । कहे सुने सौ को पतिआई ॥ धर्मदास मैं तुमहिं सुनाऊँ । अकथ कथा कथ ज्ञान बुझाऊँ ॥ तहँवां देख कबीर कर लोका । असंख्य कबीर कर देखा थोका ॥ हम जाना की हमहि कबीरू । जहँ देखा तहँ कबीर शरीरू ॥ तब अपने चित कीन्ह बिचारा । एकहि रूप सकल बिस्तारा ॥ दूजा और आय नहिं कोई । सब घट रमें कबीर समोई ॥
साखी-हम कबीर हम कर्ता, सकल सृष्टि धर्मदास । दूजा और न देखिये, सत्य शब्द परकास ॥