कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1131, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २६३ )
मनही देहरा देव पसारा । मनही पूजे पूजन हारा ॥ मनही नार पुरुष कर जाना । मनहि पुत्र मन बाप बखाना ॥ मनही राजा रय्यत कहिये । मनहि दिवान मनहि मिलि रहिये ॥
साखी—कहैं कबीर यह मनहि है, मनका सकल पसार । मन चीन्हे ते अमर हैं, गढ़ निहअक्षर सार ॥
चौपाई
कहैलग कहिये मनकी बानी । झूठ पसारा मनहि बखानी ॥ एक ब्रह्म सब घटहि समाई । नहि कहुँ आवै नहि कहुँ जाई ॥ मनकी वृत्ति यह कथा सुनावा । मनही वेद पुरान पढ़ावा ॥ मनहि शास्त्र शुभ घड़ी विचारी । उत्तम मध्यम कह निर्वारी ॥ मनही भाव बूत्त सब करई । मनके भाव योग तप धरई ॥ मनके भाव यज्ञ जो कीन्हा । मनके भाव दान जो दीन्हा ॥ मनके भाव प्रतिग्रह लेई । मनके भाव तुला सब देई ॥ यह सब है मन केर खुटाई । सतगुरु मिस सब कर्म छुटाई ॥
साखी—यह सब मनकी दौर है, मनका सकल पसार । ज्ञान चीन्ह मन अचल है, कहैं कबीर विचार ॥
चौपाई
मनकी कथा कहेउ प्रसंगा । अचरज बात कहेउ सब रंगा ॥ यह मत तौ हम तुमसों कहिया । ज्ञानी होय कोइ कोई लहिया ॥ इक अक्षर का यह है लेखा । ज्ञानी हों सोइ शब्द विवेका ॥ धर्मदास अक्षर हट जानौ । दूजा भाव न मनमहँ आनौ ॥ दूजा कहिये मनका भाऊ । ताते सत्य ज्ञान समझाऊ ॥ झूठा है मन का पैसारा । ताते चित महाँ शब्द सँभारा ॥