कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २६७ )
इतने भर्म न छूटत भाई । ब्रह्मादिक से रहे भुलाई ॥ हे कबीर हम तुमसों कही । निश्चय जान बात यह सही ॥ पुरुष बात यह मोहि सुनाई । सो मैं तुम कहैं आन जनाई ॥ धर्मदास निरखहु निज नैना । निश्चय जान परख मम वैना ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास विनवै कर जोरी । साहिब सुनहु बिनती मोरी ॥ यहै कथा तुम मोकहैं भाखी । दूसर और कवन है साखी ॥
सतगुरु वचन
तब कबीर बोले अंस बानी । सत्य बात यह सुनियो ज्ञानी ॥ यहै कथा हम त्रेता भाखी । मधुकर विप्र ताहिकर साखी ॥
साखी—यहै कथा त्रेता कही, मधुकर सों समुझाय ।
और न दूजा जानही, धर्मदास सुन भाय ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
अमृत कथा मोहि समुझावा । हृदयकमल मम आन जुझावा ॥ सतगुरु सप्रथ की बलिजाऊँ । बहुर न भवसागर महाँ आऊँ ॥ अस्तुति कवन एकमुख करऊँ । सतगुरु चरण हृदयमहाँ धरऊँ ॥ गद गद गिरा नयन भरदयऊँ । अहो नाथ मोहि बड़सुख भयऊँ ॥ बहुत अनंद भयउ मन माहीं । अचरज सुख कछु कही न जाहीं ॥ बचन सुधा रविकिरण समूहा । मम संशय यामिनिगत जूहा ॥ बहुत अनंद भयउ हियमाहीं । ब्रह्म अनंद कहो नहिं खाहीं ॥ बिनती एक सुनो गुरु ज्ञानी । तुम महिमाकिमिकहौं बखानी ॥ जो अब दायो करो गुसाई । सोई शब्दमहैं रहौं समाई ॥
श्रीसाहिब कबीर वचन
कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । हम तुम एक शब्दमहैं बासू ॥ दूसर भाव नहीं है आशा । सोई कबीर सोई धर्मदासा ॥