भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( २६९ )

जो असकहौ सकल प्रभु कीन्हा । ज्ञान गम्य कैसे कै चीन्हा ॥ काहे कहैं तुम कथा सुनाई । काहे कहैं अब ज्ञान बताई ॥ का कहैं गुरु शिष्य कहावा । कर्म अंक काहे फल पावा ॥ को बूझे अरु कवन बुझावै । कवन गुरुको शिष्य कहावै ॥

सारखी—यह संशय गुरु मेटहु, बिनती सुनो हमार । बलिहारी तुव नामकी, क्षणमें लीन्ह उबार ॥

साहिब कबीर वचन चौपाई

तब सद्गुरु बोले इक बानी । अचरज बात लेहु पहिचानी ॥ कर्म रेख तुम पूछेंउ आई । सो सब कथा तुम्हैं समझाई ॥ मात पिता मिल कर्म कमावा । ताही कर्म देह बनि आवा ॥ ब्रह्मलोक सों जब जिव आवा । कर्म रहित निर्मल पद पावा ॥ जलनिधि वारी मेघ लै आई । बून्द बून्द निर्मल हर्षाई ॥ भूमि परी ढाबर पहिचानी । इमि जीवहि माया लपटानी ॥ पवन लगे निर्मलता होई । माया मलिन दूर सब खोई ॥ जल कहैं पवन जीव कहैं ज्ञाना । ज्ञान भयेते कर्म नसाना ॥ कर्मनसे निर्मल पद पावा । ज्योंका त्यों तब आप कहावा ॥ आप चीन्ह भव जलतै न्यारा । तन छूटे पहुँचै दरबारा ॥ जब जन्मा तब कर्मका लेखा । तन छूटा तब आंखन देखा ॥ जन्म मरनतेथिर नहिं कीन्हा । ऐसी विधि है कर्मको चीन्हा ॥ जाहि समय जैसी बनि आई । ताहि समय तैसा है भाई ॥ तिहिं कर्म काल ठहराना । सब शास्त्रिनमिलकीन्ह बखाना ॥ जीव रूप ताहीसों जानी । आपको आप नहीं पहिचानी ॥ तातै ज्ञान सुनायऊ आई । जीव बुद्धि जातै मिट जाई ॥ गुरु शिष्य यह कारण आई । कर्म अंक लिखनी मिट जाई ॥ तातै पंथ चलाएउ आई । यह कारण हम ज्ञान सुनाई ॥