भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1139, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1139

बोधसागर

( २७१ )

धर्मदास वचन

धर्मन हियमें अतिही हवैउ । गद्गद गिरा नयन जल बवैउ॥ सतगुरु चरण रहे हियमाहीं । भानु उदय पङ्कज बिकसाहीं ॥ मोह निशा व्याकुल अतिभारी । तामहैं सोवत नाहिं सम्हारी ॥ गुरु दयाल मोहिं लीन्ह जगाई । आवागमन रहित घर पाई ॥ अब सन्देह रहा कछु नाहीं । शब्द तुम्हार बसा हियमाहीं ॥ स्तुति कहा तुम्हारी कीजै । अमृत कथा श्रवण भर पीजे ॥

छन्द-तुम आदि ब्रह्म अपार सतगुरु, जीवकारण आयऊ ।

काट फन्दा सकल यमके, अमरलोक पठायऊ ॥

भवसिंधु कठिन कराल भारी, पार काहू ना लयो ।

तुम कृपा गोपद जान सोई, पार धर्मनि कर दयो ॥

सोरठा-दीन्हों मोहि लखाय, परमात्म आत्म सकल ।

अमरमूल समुझाय, अमर वस्तु गुरु दीन्हेऊ ॥

इति श्रीग्रन्थ अमरमूल धर्मदास सम्बोधन विज्ञात मतवर्णन

दशम विश्राम सम्पूर्ण

इति अमरमूल ग्रन्थ समाप्त