भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ८ )

बोधसागर

तीन लोकका राज जो देई । हत्या बंधु तबहु नहिं होई ॥ जो तुम कहो उन अवगुन कीन्हा । छवहु प्रकार भारऊ लीन्हा ॥ तिन्द प्रकारन मारा चाही । तौ यह मोहि दोष नहिं आही ॥ छौमें एक प्रकार जो होई । ताके मारे दोष न सोई ॥

धर्मदास उवाच

तब धर्मदास विनय अनुसारी । छौ प्रकार कवन कह भारी ॥ तेहि प्रकारन मारा चहिये । सो सब स्वामी मोसे कहिये ॥

कवीर उवाच

देखो हत्या को अब बरना । बहु संग्राम किये का सैना ॥ प्रथमें अग्नि देई घर कोई । मारत तासु दोष नहिं होई ॥ दूजे औरको जहर खवावै । हने ताहि कछु दोष न पावै ॥ तिसरे छत्र जो लेई छुड़ाई । राज काजमें पाप न भाई ॥ चौथे नारि पराई लेही । मारे ताहि पाप नहिं तेही ॥ पंचये धन चोरावन आवै । तेहि मारे कछु दोष न आवै ॥ छठये शस्त्र लै मारन धावै । मारे ताहि विलम्ब न लावै ॥ यह अपराध मारिये जोई । मारत हत्या कबहु न होई ॥

अर्जुन उवाच

छ अपराध हमहिंकू लागै । तऊ न हतों कर्म सब त्यागै ॥ मोसों यह अपराध न होई । जो मोकहैं इहि मारि विगोई ॥ अर्जुन धनुष बान गहि डारा । सबका अपने बंधु बिचारा ॥ सब कह कुल परिवार निहारा । उपजो मोह अस्त्र गहि डारा ॥ मुनहु सन्त अर्जुनको विखादा । इह लगि कीन्हो वाद विवादा ॥ अर्जुन मोह सम्पूर्ण भयऊ । कृष्ण अपन मनमत जो ठयऊ ॥ कीजै छल यक मता विचारा । अर्जुन बुद्धि हतौ यहि वारा ॥ ब्रह्मज्ञानते यहि समुझावउ । काल रूप अपने देखलावउ ॥ तब यह मानै कहा हमारा । मारौ फोरि सकल परिवारा ॥