भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १० )

बोधसागर

तुम्हरो कीन्ह कछु नहिं होई । देखौ ब्रह्म ज्ञान करि सोई ॥ मनमें अहं कबहु नहिं कीजै । को मारै कहु को कह छीजै ॥ आपु जो करता काल कहावै । सोई यह संघार करावै ॥ मनमहँ मोह कबहुँ नहिं कीजै । इच्छा प्रभुकी गहि कर लीजै ॥ शस्त्र लेहु तुम हाथ उठाई । कारण करण करै प्रभु आई ॥ तुम शिर कछु न लागे भारा । अपु ते आप जाय सब मारा ॥ जो तुम कहो जीव सब मरिहैं । जीव अमर फिरि२ अवतरिहैं ॥ मारे मरै न जारे जरई । ताको मोह कहा तैं करई ॥ जो काया सो मन चितलाया । मृतक सदा बनी यह काया ॥ मृतक रूप सदा रहै काया । तेहि कारण तुम करत हो माया ॥ तुम हो अहो युद्ध अति आगर । यहि जगमें तुमही हो उजागर ॥ जो तुम युद्ध करो नहिं भाई । जगमें होइ है तुम्हरी हँसाई ॥ कहि है सबै युद्ध सो डरई । क्षत्रि धर्म तेरो नहिं रहई ॥ अपने कुलको धर्म जो हारै । नर्कवासको सो पगु धारै ॥ जो कुल धर्म सदा प्रतिपालै । स्वर्गवास में सो सुख चालै ॥ अपने धर्म न छाड़िय भाई । काहेको तुम करहु हँसाई ॥ लोग पंच जो निंदा करई । धिग जीवन तोको अनुसरई ॥ तब तो भली बात नहिं होई । महा दोष पुनि लागे सोई ॥ पाप होय मनमें पछिताई । नर्कवास तब रहै समाई ॥ कर्म योग तोहि वाक्य सुनावौ । स्वर्गवास ताते पहुँचावौ ॥ ब्राह्मण क्षत्री वैश्य औ शूद्रा । प्रभु कह छांड़ि भरै सब बोद्रा ॥ नरनारायण देह सवौरा । तबहु न चीन्है मूठ गवौरा ॥ ब्राह्मण कर्म सुनो चितलाई । प्रातः स्नान जपै प्रभु राई ॥ नेम धर्म शुचि संयम करई । सन्ध्या गायत्री चित धरई ॥ ठाकुर सेवा मन चितलावै । कथा कीर्तन करै करावै ॥ मनमें सेवा फल नहिं मांगे । स्वर्गवास पहुँचे सब आगे ॥