भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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उग्रगीता

( १९ )

छठये यज्ञ तपस्या भाई । आगिल जन्म राज कर पाई ॥ सतयें यज्ञ योग जो साधै । आसन मूल पवन अपराधै ॥ पूरण योग होइ जो कोई । काल त्रास कह जाने सोई ॥ जब लगि चाहे काया राखै । फिरि जन्मै तो योग अभिलाषै ॥ अठयें योग यज्ञ अधिकाई । गीता कथा पाठ करै भाई ॥ पोथी पढ़ि गुरु मारग गहई । सो भवसागरते निर्वहई ॥ नवयें ज्ञान यज्ञ है भाई । ज्ञान ध्यानमें रहै समाई ॥ दशयें यज्ञ जो प्राण पयाना । यह नारम जो रहै लपटाना ॥ एकादश है संयम सारा । सूक्ष्म भोजन करै जेवनारा ॥ देहीको मिथ्या करि जाने । प्रभु पूरण अन्तर पहिचानै ॥ द्वादश यज्ञ विधि नाम कमावै । योग युक्ति सब जानि जो पावै ॥ यहि विधि द्वादश यज्ञ हैं भाई । जो कोई करै परम हित लाई ॥ सो भावसागरते तरि जाई । विष्णुलोकमें जाइ समाई ॥ अर्जुन तुम तौ भक्त हमारे । बहुत उजागर प्रेम पियारे ॥ माया मोह चितते तुम डारो । धनुष बाण तुम वेगि सम्हारो ॥ चतुर्थाध्याय कहेउ तुम संगा । यज्ञ योग नाम सब अंगा ॥

कबीर उवाच

धर्मदास तुम संत सुजाना । सत्य शब्दका मर्म जो जाना ॥ यह तो धर्म कर्म व्यवहारा । कहा करै जिन शब्द संभारा ॥ शब्द इमार भेद टकसारा । जो बूझै सो उत्तरे पारा ॥ मुक्ति होइ सत्यलोक सिधावै । तीनि लोक बंधन मुक्तावै ॥ तीनि लोक जग आवागवना । अधर लोक है सतगुरु भवना ॥ इच्छा रूप फिरै जन मुक्ता । जहाँ पुरुष समीप संयुक्ता ॥ तहैं कर वर्णन कहा बखानों । गूँगेको सपना सम जानों ॥