कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउग्रगीता
( ३९ )
सत्य सत्य तुम वर्तहु भाई । यह उपदेश हमारो आई ॥ यह संसार सत्य नहीं सूझे । सत्यहि बूझे झूट अरूझे ॥ जैसे नलिनी सुबना गहई । ऐसे वह जग फंदा रहई ॥ सत संगति ते उठिकै भागे । नाच पवारे मन अनुरागे ॥ विषय वासमें तन मन खोवै । उत्तम देही जानि विगोवै ॥ यह संसार कालकर फन्द। विन सतगुरु नहीं छूटे बंदा ॥ जब अक्षर निरअक्षर जाने । सतगुरु शब्द करै परवानै ॥ सार शब्द मैं आनि पुकारा । जो बूझे सो उतरे पारा ॥
छंद—वहो बहुविधि बूझि देखों धर्म दारुण काल हो ।
वेद पुराणमें सार गीता जस कहौ विकराल हो ॥
विश्व सब भोजन करै यह सर्व वसुधा पाल हो ।
दया जाके ताहि आवै सब जीव राखै हाल हो ॥
सोरठा—ज्योति सरूपी काल, सदा अखंडित लव वरै ।
कबहुँ न होय दयाल, जीवजंतु सब लै जरै ॥
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कच्चीरधर्मदाससंवादे
विरहरूपन्यास्यानो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
कहैं अर्जुन सुनु अन्तर्यामी । पूर्ण पुरुष अगम तुम स्वामी ॥ ज्ञान सृष्टि भक्ति अधिकाई । निर्गुण सगुणमें को अधिकाई ॥ यह संशय उपजे जिव मोरा । कृपा करो तुम करौ निहोरा ॥ अर्जुन जो पूछेउ परभाऊ । सो अब प्रकट बखानौ दोऊ ॥ ज्ञानी अधिक करे जो ज्ञाना । निशि वासर रहै ज्ञान समाना ॥ भक्ति करे जो मन चित लाई । निस दिन सुमिरे हम कहैं भाई ॥ बहुत भांति कै सेवा लावै । प्रेम मम मेरो यश गावै ॥