भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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उग्रगीता

(५५)

त्रिगुण तपस्या वर्णन

तनसो देवता पूजा लावै । गुरु और ज्ञानी पूज पुजावै ॥ शुचि संयम जो कोमल रहई । ताकर काल पला नहिं गहई ॥ ब्रह्मचर्य पुत्रि आनि जेवावै । रहै अनिच्छा सत्य न खोवै ॥ यह तन पूजा करै सुजाना । गुरु गोविन्द को धारे ध्याना ॥ सत्त्विक मन तप कहौं बुझाई । इन्द्री सबै हाथ जेहि आई ॥ प्रथमै प्रसन्न जो राखै । मौन रहै अमृत रस चाखै ॥ आतम निग्रह करै सुजाना । अन्तर्भाव सुधा निर्वाना ॥ तपस्या मनकी कही सुनाया । सुधा सरूपी सतगुण भाया ॥

सात्त्विकी वचन तपस्या वर्णन

वचन तपस्या करो बखाना । यह तप मुखते भया प्रवीना ॥ अभय वाक्य ताकूं भइ नाहीं । सत्ति सरोत्तर जस मुख माहीं ॥ प्रिय हित साधु वचन सो कहहीं । पाठ करी करि जन्म सुधरही ॥ एते वचन तपस्या होई । मुखते करे करावै सोई ॥ तीनि तपस्या सतगुण भावा । सो तौ वर्नक वर्नि सुनावा ॥ रजस तपस्या त्रे प्रकारा । ताकूं अब मैं करो प्रचारा ॥ तीनि तपस्या राजस भाई । तनसों तपकरि लोक देखाई ॥ मनसों कपट कबहुँ नहिं छूटै । वचन सदा मुख बोले झूटै ॥ तीनि तपस्या राजस होई । ऐसी भांति करे जो लोई ॥ तामस तप है तीन प्रकारा । शुभ अशुभ कछु नाहिं विचारा ॥ हठ करि तपसो तनको गारै । मनमें कोध सदा जो धोरै ॥ वचन कठोर बहुत सो बोले । तामस ताप अहं लिये डोलै ॥ तीन तपस्या त्रिगुण सुभावा । सो तौ वर्नक वर्नि सुनावा ॥

त्रिगुण दानका वर्णन

तीनि प्रकार दान अब वनौं । उत्तम सेवा ब्रह्महि चीन्हौं ॥