कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउग्रगीता
( ६३ )
पावै अगम कृष्ण को मानै । तीनि लोकको भूपति जानै ॥ ताते ज्ञान कहि कर्म दृढ़ावै । फिरि २ भवसागर भटकावै ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास कहैं सुनो गोसाई । मारग साधु जो अगम सुनाई ॥ कर्म धर्म कह पाछे मेलै । ज्ञान रूप अभ्यन्तर खेलै ॥ परम अनंद पुरुषको दर्शै । सेवक स्वामी चरण न पशैं ॥ गीता कहै औ कर्म दृढ़ावै । केहि कारण इनको भटकावै ॥ कौन ज्ञान जो भर्म बतावै । फिरि २ भवसागर भटकावै ॥
कवीर उवाच
धर्मदास मैं कहौ बुझाई । मूरुख लोग नहीं पतिआई ॥ तीनिउ लोक पुरुषपहि दीन्ह। राजे काज करावन कीन्ह। ॥ जो चाहै सो रचे बनावै । तीनि लोकते जान न पावै ॥ ज्ञानोपदेश देह जो भाई । तौ यह सृष्टि वैराग उठाई ॥ तब यह रचना सबही थाके । इनको कौन गोसाईया थापे ॥ तेहि कारण इन कर्म दृढ़ाई । अरुझी सृष्टि सकल भर्माई ॥ सतगुरु शब्द सुना कहैं दरसै । जाते प्रभु पूरण कहैं परसे ॥ गीता कहि जो कृष्ण सुनाई । तबहु न अंधा मोहि पतिआई ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास बिनती अनुसारि । हे सतगुरु मैं तव बलिहारी ॥ जब कर अर्जुन धनुष संभारा । कहा कीन्ह सो कहौ विचारा ॥
कवीर उवाच
सुनो संत धर्मनि निर्वाना । अंत युद्ध सब करों बखाना ॥ बहुते भांति युद्ध तिन कीन्ह। युद्ध जीति राजहि मन दीन्ह। ॥ राज युधिष्ठिर मनहि विचारा । बहुते भांति बंधु हम मारा ॥ कस प्रायश्चित्त मोक्षण होई । कहो व्यास हमसों तुम सोई ॥