कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउद्गीता
( ६५ )
ताते कछु संदेह न कीजै । वेगि हेवारे पयाना दीजै ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास पूछै सुनु भाई । आगे कैसे भई गुसाई ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर यह सर्ग बखाना । तुमसों वर्णन कहौं निदाना ॥ पांडव जाइ हेवारे गलिया । देह समेत युधिष्ठिर चलिया ॥ करेउ पुण्य जप तप औदाना । ताते पहुँचे स्वर्ग स्थाना ॥ और पांडवा नर्क समाने । हत्याके फल नर्क रहाने ॥ तहां जाइ कोइ बंधु न देखा । पूछेउ सबै देव मुनि शेषा ॥ कहां हमारे चारिउ भाई । केहि कारण मोहि इहां ले आई ॥ इहां कहां वे बसवे पाई । जाके खोजौं चारिउ भाई ॥ तुम राजा हो धर्म अवतारा । ताते पहुंचै स्वर्ग दुआरा ॥ बंधु तुम्हार पातक बड़ कीन्हा । ताते बास नर्कमें दीन्हा ॥
युधिष्ठिर उवाच
की उनको इहवां लै आवहु । की हमको उहवां लै जावहु ॥ जब यह विष्णु सुनो मन जानी । इनकह पुण्य बहुत पहिचानी ॥ उपजो मोह बंधु हित भाई । जाइ ले आवहु बंधु देखाई ॥ नर्क कुण्ड तेहि जाइ देखाई । बूड़ देखे चारिउ भाई ॥ और सकल परिवार घनेरा । काहू सुधि नहिं काहू केरा ॥ चारिउ भाई रोवन लागे । कर्म हीन हम बड़े अभागे ॥ राइ युधिष्ठिर मोह जनाऊ । मोह नर्क कुंड ले नाऊ ॥ दूत विष्णु सों बहुरि जनार्द । आपु युधिष्ठिर नर्कमें जाई ॥ जो कछु आज्ञा होइ गोसाई । आज्ञा मानि करौ सोइ जाई ॥ कहै विष्णु यह धर्म सरूपा । करो युधिष्ठिर पुण्य अत्रुपा ॥ जो कबहीं वे नर्क में जैहैं । अघ जीवन सब ले उत्तरे हैं ॥
नं. ८ कबीर सागर - ३