कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1221, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्थितिचोथ
( ८१ )
अगर विहंग सुरति भयउ जबहीं। हंस सुजन जन प्रगटे तबहीं ॥ विदेही अंग थान्यो प्रभु आई। विहंग इच्छा तबहीं उपजाई ॥ बिदेह देहधरि भौ उजियारा। सूर्य उदित मूदितं भये तारा ॥ देह धरे हाथ ओ पाऊँ। रतन रंग बहु रंगवाऊँ ॥ वहतो नाम सुजन जन चीन्हा। दया कीन्ह प्रभु हमहूँ दीन्हा ॥ सञ्जीवन नाम आदि प्रकाशा। हंस सुजन जन कीन्ह निवासा ॥
साखी-जोइ गहे निज नामको, सोई हंस हमार। कहैं कबीर धर्मदासों, उतरे भव जल पार ॥
धर्मदास वचन
चरण टेकि बिन्ती अनुसारी। साहब वचन जांव बलिहारी ॥ प्रथम स्थूल कहो समुझाई। बिदेह रूप जब पुरुष रहाई ॥ केतिक सज्याको परमाणा। जहँवा आप कीन स्थाना ॥ सोइ भेद प्रभु कहो निनारा। जीवन जन्म सुक्ति होय मोरा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास तुम बिन्ती कीन्हा। अगम पंथ काहू नहिं चीन्हा ॥ मैं पाया सतगुरुकी दाय। धर्मदास मैं तुम्हैं लखाया ॥ जेहि विधि पुरुष रूप संधाना। सो सब तुमसों कहौ निदाना ॥ अग्रमूल विदेह स्थाना। सोइ नाम सुजन जन जाना ॥ अब लों लङ्क द्रौप दिखलाऊं। बारह पलंग विस्तार सुनाऊं ॥ बीजक अमान अखंडित द्रौपा। सत चैतन आनन्द सर्मापा ॥
साखी-अन्तरिक्ष छः पालंगभरि, लोलंग द्रौप स्थान।
तहाँ सो सब उत्पति भई, यही परमपद जान ॥
कंचन हेम द्रौप उजियारा। तहाँते उत्पति भई हमारा ॥ तेरह पालंगा है सो ठाऊं। तिल प्रमाण सेज्या निर्माऊं ॥
१ गुप्त