कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्थितिबोध
( ८३ )
साखी-अब मैं कहब तोहि सों, ए चित करो विचार । कहै कबीर पुरुषको, यही रूप निज सार ॥
चौपाई
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अग्रमूल बिदेह परकाशा ॥ इच्छा पुरुष काया बंधाना । लीलागर दीप कीन्ह अस्थाना ॥ सुजन हंस जन कीन्ह विश्रामा । धरै ध्यान पुरुषकर नामा ॥ तहैंवा पुरुष कीन्ह अस्थाना । अस्थल रूपको कहों ठिकाना ॥ कंठमाल पुढुपनकी राजे । माँथे प्रभुके छत्र विगजे ॥ हाथ अमी अंकूर बिचारी । जगर मगर शोभा उजियारी ॥ उपमा काकहि वरनों भाई । कोटि भानु सोजायैं लजाई ॥ भालरूप वरनन कहि कैसा । बीस सहस्र चंद्र लखि जैसा ॥ शरवन शोभा देहु बताई । रवि सहस्र तहाँ रहे लजाई ॥ चक्षु अमीकर चितवन कैसी । सुधा सिंधु लहरे उठ जैसी ॥ नासा श्रीवा कंठ कपोला । शोभा इनकी आइ अतोला ॥ मुखारविंद अरविंदहि जानी । उदय कोटि सूरजकी खानी ॥ उभय हंस अघरमो विहरे । दामिनि दशन उठत जनु लहरे ॥ भुजा बाँह मन चिकुर बनाई । हृदय राखि उर कलित लजाई ॥
साखी-कटि नाभि पिंडुरी जंघनि, नख सिख बहुत अनूप ।
झलझलात झलकत महा, शब्दहि रूप सुरूप ॥
चौपाई
निगम नेति नेतिहि करिधावे । तिनको रूप बरन को पावै ॥ मन बुधि चित पहुँचे नहिं तहाँ । अबरण पुरुष विराजे जहाँ ॥ जहाँ लों निजमन दर्शन पावा । तहाँ लंगि वरणि कबीर सुनावा ॥ अगम अगाय गाधमो नाही । ज्योंके त्यों प्रभु सदा रहाहीं ॥ अग्र नाम पुरुषके बरणी । भवसागरकी है यह तरणी ॥