भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1227

ज्ञानस्थितिबोध

( ८७ )

अब प्रभु मोपर दया हि कीजे । भेद अमीको मो कहिदीजे ॥ अमी अंक केहि कारण कीन्हा । वह तो अंक मोर नहि चीन्हा ॥ सो प्रभु मोकहैं देहु चिन्हाई । अंक विस्तार कहो समुझाई ॥

सदगुरु वचन

धर्मनि तुम विनती अनुसारी । सोई भेद अब कहो विचारी ॥ ज्ञान स्थिति हम कीन्ह बखानी । जाते भई सकल उत्पानी ॥ जबहि देह धरी प्रभु आई । अमी अंक है अंक बनाई ॥ अशर नाम देह धरि आई । अंक यही मैं कहो बुझाई ॥ स्थूल धरो साहिब यहि कारण । बिन अस्थूल न वस्तु उचारन ॥ मूलहि अंक विदेह विचारा । देह धरी नामहि संचारा ॥ जो नहि होत नाम परभाऊ । तो सब जगतकाल धरिखाऊ ॥ जोकहैं लेइ नाम टकसारा । देह छूटी जाय पुरुष दुवारा ॥ जबही नाम लेतहैं हंसा । तबही काल मरत है संसा ॥ तारण हंस देहमें धरहूँ । यमको मारि मुक्ति मैं करहूँ ॥ नाम प्रताप सबै कछु भाखा । सुमिरत हंस बोल हम राखा ॥

साखी—हंस उबारन नाम यह, कहैं कबीर बखानि ।

जाय जीव सतपुरुष घर, धरमराय पछितानि ॥

चौपाई

अमी अंक जब ही प्रभु कीन्हा । उत्पति सकल ताहि हम दीन्हा ॥ पुछुप दीप सब दीप निवासा । तीन लोक याते परकाशा ॥ स्वर्ग पताल भयो पुनि सबही । अमी अंक पुरुषहि किय जबही ॥ चन्द्र सूर्य सकलहि विस्तारा । अमी अंक सो भयो संसारा ॥ अमी अंक दोइ रूप बनावा । पुरुष शक्ति सो नाम कहावा ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश विचारा । अमी अंक ते सब संसारा ॥ अमी अंकके गुण हैं ऐसे । सोरह सुत उत्पत भये तैसे ॥ अमी अंक जब नाहीं कीन्हा । तबही सुनहि शब्दमें चीन्हा ॥