कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1229, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानास्थितिबोध
( ८९ )
जब आवै बालकके पाहा । पलटे देह धरै निजु नाहा ॥ भक्तिरूप धरि आवै सोई । मस्तक श्याम फेर नहिं होई ॥ जब जिय नाम करै सम्भारा । तब यमकी जड़ होवे छारा ॥ शब्द सिंधुमें रहै समाई । तहांयम कबहु निकट नहिं आई ॥ शब्दविचार बारि टढ़ करहीं । मूल हंस रखवारी धरहीं ॥ जब फिर चाहे करन पयाना । अग्रज नाम करी संधाना ॥
साखी-वंश छांय बीरा लिखो, नाम सन्धि चित लाय । कहै कबीर निःशंक हो, हंस लोक कहैं जाय ॥
जब सठहार चले लै हंसा । सत सिंधु पहुँचत गइ संसा ॥ सत सिंधु आसन जो करहीं । हृदय रूप हंसा सब धरहीं ॥ आगे लेन हंस तहैं आवहि । आरति साजि चीर पहिरावहि ॥ कुशल क्षेम पूछे सब कोई । यमकी लज्जा किहि विधि खोई ॥ कहि प्रसाद आइ यदि ठाऊं । केहिं करनी पहुँची इहिं गंजि ॥ तबै हंस उठि बोले बैना । गुरुप्रसाद पाया निज नैना ॥ गुरु मोहि वह नाम सुनाई । तेहि प्रताप आये इहि ठाई ॥ तबही हंस पुरुष सौ कहई । हंसन चाह दर्शकी अहई ॥
साखी-नाम महात्म कबीरको, तेहि प्रसाद सो आइ । बिनय करत अभिलाष चित, पुरुषहि दरस कराइ ॥
चौपाई
पुरुष बुलाइ हंस कह लीन्हा । हंसन सकल डण्डवत कीन्हा ॥ दीन सिंहासन क्षत्र जु धरहीं । हंस सुजन जन दर्शन करहीं ॥ सिंहासन बैठी सुख पावा । शब्द अहार पुरुष संग आवा ॥ जन्म मरनकी भूख बुझाई । सब सुख भुगते अग्र अघाई ॥ निरंजन सुख सुधि नहिं पावा । ब्रह्मा विष्णु बैठि पछितावा ॥ वहतो हंस कहाँ उड़ि गयऊ । आदि अंत काहू नहिं लयहू ॥