भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानस्थितिबोध

( ९१ )

रत्न कमल पै सत्य विराजे । हिरमर हंस संग बहु छाजे ॥ गोरख दंत पहुँचि नहिं कोई । पारब्रह्म अस भवन है सोई ॥ ये सब अटकहिं सुनि मंझारा । सत्य पुरुष नहिं कीन्ह विचारा ॥ चउदा कमल महुं सुत्र विराजे । द्वादश कमल गगन धुनि गजै ॥ भर्म भूलि अटके तहां ज्ञानी । भर्महिं भर्म भर्म लपटानी ॥ सुर नर मुनि पवनहि अवराधे । सिद्धहु बारे उनमनि साधे ॥ नाभी मण्डल पवन किवारा । तहैं लगि गमी कीन्ह टकसारा ॥ हमरा घर कहैं विरलन बूझा । ऊर्ध्व कमलका पंथ न सूझा ॥

साखी-सुरति कमलपर बैठिके, अमी सरोवर चाखि । कहै कबीर विचारिके, संत विवेकहि भाखि ॥ ऊर्ध्व कमलकै उपरै, परिमल बास सुवास । अमी कमल महुं बैठिके, दर्शन दर्श हुलास ॥

चौपाई

उत्पतिको वह वृक्ष बखानी । प्रलय कबहुं होवे नहिं हानी ॥ पिण्ड मांह वह वृक्ष बताऊं । अगम अगोचर गम नहिं पाऊं ॥ अगम गोष्ठि तुम पूछन लाई । सुनो धर्म अब कहौ बुझाई ॥ अगम गोष्ठि अगम व्यवहारा । अगम पंथ हम कहौ विचारा ॥ अब मैं कहौ जो गम्य बखानी । अगम गोष्ठि काहू नहिं जानी ॥ उत्पति सब मैं तुम्हैं सुनावा । ये हमते कोउ जानि न पावा ॥ उत्पति सुनु वा वृक्षकी भाई । प्रलय तेरे वह कबहुँ न आई ॥ जासों कहों अमरपुर गाऊं । बिना बीज वह वृक्ष रहाऊं ॥ बिन धरती अंकूरहि आनी । पानी रंग नहीं उत पानी ॥ मूलवृक्ष वह पुरुष बखानी । शाखा तासु निरंजन जानी ॥ डाली ब्रह्मा विष्णु मधेश्वर । पत्र तासु संसार नरेश्वर ॥ सत्य सुकृत जहँ कर विश्रामा । अछय वृक्ष जाकर है नामा ॥ पत्ररूप संसार बखाना । धर्मदास लखवो यह ज्ञाना ॥