कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1237, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्थितिबोध
( ९७ )
तुमही माली तुम फुलवारी । तुम हो करता तुमरी बारी ॥ तुम सागर जलहरी तरंगा । तुम मलीन तुम निरमल अंगा ॥ तुम हो उडुगण पर्वत चंदा । मोये तुमये हर्ष अनन्दा ॥ तुम गुपाल तुमहो दिन राती । सुर नर मुनि गंधर्व तुम ज्ञाती ॥ तुमही अलख तुमहि संसारा । तुमही हरि हर विधि अवतारा ॥ तुमही लोप अलोप अलेखा । तुमही गुप्त प्रगट सब देखा ॥ तुमही पुरुष तुमही हो प्रकृति । तुमही योग तुमहि जुगति गति ॥ चारों युग तुम करत निवासा । तुम रमता देहीमें बासा ॥
साखी--तुमहो दूसर अवर नहीं, तुमरा सकल प्रकाश । करहु दया अब मोहिपर, सत्य नाम विश्वास ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास तुम विनती कीन्हा । हमरो रूप न काहू चीन्हा ॥ अमरभेद अस्थलकै माहीं । जो पावै अस्थिर मन ताहीं ॥ लीलंगर द्रौप पुरुष अस्थूला । वही द्रौप उत्पतिको मूला ॥ गगन धरनी उत्पति सब नीरा । काया बीर सुनाम कबीरा ॥ याविधि पुरुष हमहि सोंकहिया। विन अंकुर जीव कहाँ रहिया ॥ नाम हमार सुमिरे जो कोई । आवा गमन रहित सो होई ॥ हमरा नाम लेत घर आवै । सुख सागर निर्मल हो जावै ॥ नाम लेत जो काल डराई । सुमिरत नाम हो दूर हो जाई ॥ हमरो नाम सार है भाई । जो चीन्हे तेहि काल न खाई ॥
साखी--नाम हमारा मुक्तामणि, पुरुष आपहि भाखी । शब्द शिरोमणि सार यह, हंस सदा चित राखि ॥
चौपाई
येहि नाम लोके पहुँचावै । सुमिरत नाम पुरुष कहैं पावै ॥ अब यह शब्द कहउ सम्भारा । सुनि हृदय महे करो विचारा ॥
नं. ८ कबीरसागर-४