भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानस्थितिबोध

( १०६ )

मृतकहि देह धरे संसारा । बिना शब्द है काल अहारा ॥ स्नान शब्द हृदयमें धरहीं । जीवनमुक्ति होइ भव तरहीं ॥ यही शब्दसो धोवे अंगा । दिव्यदेह जानो परसंगा ॥ जो कोइ करे शब्द असनाना । ताकर धोखा जाय निदाना ॥ लक्षहि दान करै नर कोई । जीव दया बिन मुक्ति न होई ॥ जो धोवे निश्चय करि देहा । तबही कीजे शब्द सनेहा ॥ कहे शब्द अब कहो बखानी । धर्मदास लीजो शिर् मानी ॥ नित्य प्रीतिकर शब्द स्नाना । ताकर दोष न रहै निदाना ॥

स्मरण

साखी-अगम सरोवर विमल जल, हंस बैठिके न्हाइ ।

काया कंचन मनमगन, कर्म भर्म मिटि जाइ ॥

पिंडहिसों ब्रह्मांडहि जाना । मान सरोवर करि असनाना ॥ सोहं सोहं ताको जापा । लिखत न करै पुण्य औ पापा ॥ पुण्य पापसे रहत न न्यारा । पैठि संत जन करो विचारा ॥ याहीविधि जो करि असनाना । सो हंसा करै लोक पयाना ॥ धर्मदास सुन शब्द विशेषा । गंगवारु इतने है लेखा ॥

स्मरण सम्पूर्ण

आदि अंत सब कहों बखानी । धर्मदास कीजो बिलछानी ॥ मूलपुरुष काहू नहिं जाना । सो तुमसो सब कहों बखाना ॥ मूलशब्द तहाँ अग्र कहावा । अग्र विदेह अस्थूल सुभावा ॥ मूलभेद काहू नहिं पावा । मूलनाममें गुप्त छिपावा ॥ कहैं प्रतीत देखी मैं तोरी । तातैं कहों मूल निज डोरी ॥ मूलहि शब्द असंभव नामा । कहैं सुनै नहिं पावै ठाना ॥ चारलोक चार है नाऊँ । चार चार सो बरन सुनाऊँ ॥ सीख गुरु या बिचि जो धरहीं । जैसी विधि तुम हम सो करहीं ॥