भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ११४ )

बोधसागर

सत्य सुकृतकी रहनि रहि, गंह अर्जमन नाम । कहै कबीर धर्मदाससों, सत्य शब्द परमान ॥ सत्य सुकृत लों मेंड़ है, ग्यान ध्यान धर धीर । शब्द अजानन है वही, सोई संत कबीर ॥ अजर अमर वह पुरुष है, सत्यनाम बैधि छोर । कहे कबीर धर्मदाससों, थाह शब्द शिरमोर ॥

चौपाई

अब मैं कहौ अकाश बिचारा । जिहिबिधि भयव तासु विस्तारा ॥ अकाश अंड मध्य जो रहेऊ । अकाश भेद बिरले जन रहेऊ ॥ अकाश अंग सो सब निर्मावा । शून्य मंदिरतें नाभी आवा ॥ पृथिव अकाश योग अब कीन्हौ । शब्द हेतु काहु बिरले चीन्हा ॥ तालमृदंग अकाशते होई । रहित शब्द पुनि सुनी समोई ॥ अकाशबीच असहोय गुजारा । बिना मृदंग शब्द झनकारा ॥ अकाश पेट अकाशहि चीन्हा । सुरति सुनी आकाशहि दीन्हा ॥

सखी—कहै कबीर अकाशगुण, बूझत बिरला कोय । लीलारंग अकाशका, सुनिनो सत्य बिलोय ॥

चौपाई

जो मंदिर अकाश नहि देखे । तबलगि शब्द रहत अनपेखे ॥ पाँच अकाश तबै लखिपाई । जबै मंत्र गायत्री आई ॥

सारखी—भेदाकाश गुण अधरहै, ज्यों लखि पावै कोइ ॥ नहिं अक्षर लखि आवही; पहुँचे निज सोइ ॥

मंत्र गायत्री

धर्मदास विनवे करजोरी । भाषों शब्द गायत्री डोरी ॥ भेद गायत्री बालकको दीजे । प्रेम सुफल बालकको कीजे ॥