भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानस्थितिबोध

( ११९ )

चौपाई

तहाँ पुरुषने सेज विछाई । चन्द्र सूर्य जहाँ रहे लजाई ॥ तिलभर सिज्याको परवाना । सोहें सुरति अभयपद ज्ञाना ॥ तहवाँ पुरुष करहिँ आनन्दा । जिनसों अमी भए सब छन्दा ॥ तहाको बरन कहे को भाई । लक्ष जीवसों नाहिँ कहाई ॥ अमर चीर सोहें अस अंगा । सूर्यमणीसों अधिक सुरंगा ॥ यही व्रत हंसनको भाई । पुरुष रूपको कहै बनाई ॥ शोभा कहो दोऊ कर पानी । चन्द्र सूर्यकी ज्योति छिपानी ॥ सर्व वरणको कहो बुझाई । उभे सूर्य मानो उमगाई ॥ दंत सुरंग शोभित अति भारी । मानो मणि बत्तीस विचारी ॥ बालरूप का कहों बखानी । चन्द्र किरण मानो लपटानी ॥ इक २ चरित वरणि नहि जाई । मानहु सुकृत सत्य उमगाई ॥ अधर नासिका सोहत कैसा । उभय हंस बिहरत है जैसा ॥

साखी-बरणन सबका याहको, मोसों कहो न जाय । उपमा केहिको, दीजिये, पटतर नाहि दिखाय ॥ सूर्य होय समुद्र भर, भू अकाश भरि चंद । तबहु न पटतर पाइये, पुरुष वदन आनंद ॥ राई भर वह वस्तु है, अधराई अस्थूल । लहर लहर घटमेंकरै, वही पुरुष निजमूल ॥ इह गुण ज्ञानस्थितिहिके, कहे कबीर समुझाइ । पुरुष ध्यान जबही करै, सब दुख जाय पराइ ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास तब बिनती ठाना । दीन्हों मोहि मुक्ति फलदाना ॥ साहेब कहिए मोहि बखानी । सत्ताइस दीप कहो बिलछानी ॥ दीपनको कहिये मोहि लेखा । जामे परचे शब्द विवेका ॥