भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानस्थितिबोध

( १२५ )

अन्तर ध्यान बहुरि प्रभु भयञ्जः। धर्मदास विलखत मन भयञ्जः॥ रुदन करत फिरै विलखाता । कहैं ना देखे साहब गाता ॥ मोहि अपराधी कस प्रभु छांङ्गा । विरह ज्वाल जरही मन भांङ्गा॥ हौ अपराधि करम कर हीना । साहेब तरस परै नहिं चीन्हा ॥ बिन देखे नहिं जियत न आऊँ । गुरुचरणामृत बिन पछताऊँ ॥ अपना दास दास प्रभु कीन्हा । अग्रिम पदार्थ हम कह दीन्हा॥ अब साहेब मोहि दर्शन देहू । तुम बिन कासो करब सनेहू ॥ दिवस आठ अन्नहि बिन बीता । बिना कबीर जीव नहिं जीता ॥ या विधि बारह दिन हो गयहू । तब साहब फिर दर्शन दियहू ॥

साखी-सजिव भये निजीवते, अति अनन्द उर बाढ़ि ।

धर्मदास मन हर्ष भा, सुख अनन्द हिय गाढ़ि ॥

चौपाई

धर्मदास बिनती तब लाई । इतने दिवस दरस बिन जाई ॥ हम तो भ्रमर कमलके वासी । जल बिन मीन सुरतिज्यों प्यासी ॥

सद्गुरु वचन

तब साहब अस भाखब बैना । अब तुम देखो अपने नैना ॥ देखहु धर्म निरूप हमारा । हमही छांङ्ग और चित धारा ॥ हिरिणिरूप धरो प्रभु तबहीं । कोटिन भानु छिपाने जबहीं ॥ येहि रूप है आदि हमारा । हठ नियह जिन करब बिचारा ॥ जब तुम इतना कीन्हा उपासा । तब कह दरस पाइ हम पासा ॥

धर्मदास वचन

भये कृतार्थ दर्शन लीन्हा । धर्मदास न्यौछावर कीन्हा ॥ बहुरि दास उठि पायन परही । चरण टेक बिनती अनुसरही ॥ जबसे पावब नाम तुम्हारा । तबसे सुनब लोक व्यवहारा ॥ अब मनसौं अभिलाखा येही । सोक दिखावहु पुरुष विदेही ॥