भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानस्थितिबोध

( १३९ )

चलते फिरत वचन अस भाखा । चेत अचेत बोध नहीं राखा ॥ पुत्री पिता बंधु नहीं जानै । माता बहिन नाहिं पहिचानै ॥ श्रीहि अभूषण धरै न अंगा । तृषा क्षुधा नहीं स्वाद उमंगा ॥ ऊंच नीचकी नाहिं बिचारी । धर्म अधर्म दोऊसे न्यारी ॥ दुख सुख सब एकहि करिजानी । विदेह अंग ऐसे पहिचानी ॥

साखी-काया सीप सम जानिये, स्वातिशब्द पट आन । परख नेह संपुट बँधौं, मुक्ताहल उतपान ॥

चौपाई

धर्मदास इह भेद विदेहा । इह धन धन्य और सब खेहा ॥ जस चकोर चंदा कह ताकै । याविधि लिप्त नामके नाकै ॥ कमलचक्र है मनको रूपा । स्वप्नरूप भर्मित वह भूपा ॥ पाँच पचीस कठिन बिकारा । देह बीच इन राज पसारा ॥ सेमर फूल जस किरुवां आवा । देखि फूल बहु हरष बढ़ावा ॥ जुंगल गारत सुआ उड़ानो । रोम रोम मिथ्या कर जानो ॥ जाना नहीं विवेक बिचारा । ठोक कपार चलो झँखमारा ॥ मायारूप आहि इमि भाई ! जिमि फूल सेमर सुन्दरताई ॥

साखी-नारीरूप नर देखिके, कूकर सम लिपटाय । बिषय वासनाँ बँधि रहि, विदेहमुक्ति किमि पाव ॥

चौपाई

घरी घरी मन काम जगावै । ज्ञान भुलाय नाम विशरावै ॥ स्वप्न माँहि सोई छल करई । गुप्तवासना हृदये धरई ॥ कूद कूपके अगिन मँझारा । राखै कौन जीव निजु सारा ॥ सम्मुख आय बाघके कोई । भक्षण यतन करै वह सोई ॥ रक्षक शब्द जाहि तन गाजै । उलटो काल तहाँसों भाजै ॥ यही शब्द घट राखि समाई । माया ताहि खान नहीं पाई ॥