कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1281, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्थितिबोध
( १४१ )
लिखे पढ़ै नहिं पावै भाई । बिन सतगुरुको देह लखाई ॥ प्रेमसुधारस तबही पावै । गुरु बहियां मिलि भेद लखावै ॥ चित आनंद अस्थिर तब जानै। सुमिरन भजन नाम पहिचानै ॥ मातु पिता सुत नारि पियारी । पुरजनजलसम रहनि विचारी ॥ नाम गोत्र तन शीतल कीन्हां । मिथ्या नारिपुत्र कुल चीन्हां ॥ भूखहि प्यास गई तन ताको । दुख औ सुखकी आसन जाको ॥ अर्थ द्रव्य मिथ्या करि जानी । बुधकी बुधी रहित कर मानी ॥ भली बुरीकी नहीं विवेका । जहाँ देखो तहाँ आनंद पेखा ॥ पाप पुण्यकी संशय नाहीं । संत कुसंत रहित जो आहीं ॥ मन बुधि चितते रहे भुलाई । पांच पचीस राखि अरुझाई ॥ बैठे उठे दूजा नहिं आनै । उत्तम मन अमृतरस सानै ॥ मन अरु वचन रहित करि जानै। खासा बीज नाम धुनि तानै ॥ नयन नासिका रहित अनन्दा । उदित भए जनु पूरण चन्दा ॥ हाथ पांव इन्द्री बस कीन्हे । सुर्य चन्द्र रहित घर चीन्हे ॥ जो देखे सो रहितै देखे । रहित अनन्द अवर नहिं पेखे ॥ सब गुण सहित रहन है ज्ञानी । रहित बिना है भेद दिवानी ॥ जब ही रहित आप वह कीन्हां । पुरुषहि समसर जो जिय चीन्हां ॥ रहित शब्दमों है मतवाला । ताकहँ देखि मूर्छि रहि काला ॥ सुरति सम्हार नाम दृढ़ लीजे । नाम सुधारस भरि भरि पीजे ॥
साखी-इहगुण ज्ञानस्थितिहिको, रहित मुक्तिकर भेद । कहे कबीर धर्मदाससों, नाम अमोलिक लेव । रूप मगन मन हो रहौ, अंग अंग सुखधाम । जिमि मिसि कागद पत्रही, होत सुअक्षर नाम ।
चौपाई
प्रेम पियाला कठिन रहाई । सत्यरूप धरि पीवे अघाई ॥