भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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सद्गुरुस्तुतिः

श्लोकाः

सत्यं ज्ञानस्वरूपं विमलमधिगतं ब्रह्म साक्षान्नुरूपं शीर्षन्यस्ताच्छरत्नद्युतिसितमुकुटं भेतवासोऽभिरामम् । भास्वन्मुक्तावलीभिः कृतरुचिहृदयं दिव्यसिंहासनस्थं भक्तानां पारिजातं विकसितबदनं सद्गुरुं नौम्यहं तम् ॥१॥

सत्य और ज्ञानके स्वरूप, विमल साक्षादब्रह्मको प्राप्त मनुजस्वरूप, मस्तकमें धारण किया हुआ, स्वच्छ होरा आदि रत्नोंकी कांतिसे धवलित मुकुटसे युक्त, स्वेत वस्त्रोंसे अलंकृत, देवीप्यमान मोतियों की मात्राओंसे शोभित हृदय, दिव्य सिंहासन पर विराजमान, भक्त लोगोंके लिये कल्पवृक्ष प्रफुल्लित मुखारविंद है जिसका उस सद्गुरुको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १ ॥

यदंद्ध्यनुध्यानविभूतमोहाःसन्तो महत्त्वं शमवाप्य यन्ति । ब्रह्माऽद्वयं निर्गुणमाश्रुहं तं सत्यनामानमहं नतोऽस्मि ॥२॥

जितके चरमके ध्यान करनेसे संत लोग मोह पाशसे छूटकर महत्त्व और कल्याण को प्राप्त होते हैं, उस अर्द्ध ब्रह्मस्वरूप सत्य नामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥

यस्यामलेन यशसा विशदीकृतेऽस्मिंद्भोके जनोऽज्ञतमसं तरसा विभूय । सन्तं पुमांसमधिगत्य शमेति तस्मिन् श्रीसत्यनामनि परे जगतो रतिः स्यात् ॥ ३ ॥