कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानसागर
( ३ )
धर्मदास वचन-चौपाई
विनकैं स्वामी दोह कर जोरी । कहौ गुसाईं नामकी डोरी ॥ निरंकार निरंजन नाऊं । जोत स्वरूप सुमरत सब ठाऊं ॥ गावहि विद्या वेद अनूपा । जगरचना कियो ज्योति सरूपा ॥ भक्त वत्सल निजनाम कहाई । जिन यह रचि सृष्टि दुनियाई ॥ सोई पुरुष कि आहि निनारा । सो मोहि स्वामी कहौ व्यवहारा ॥ जिह्ति होय जीवको काजा । सो मैं करहुँ छोड़ कुल लाजा ॥ होहु दयाल दयानिधि स्वामी । बोलहु वचन सुधा रस वानी ॥ नाम प्रभाव निज मोहि बताओ । होहु दयाल मम तृषा बुझाओ ॥
साखी-जो कुछ मुझे सन्देश है, सो मोहि कहो समुझाय । निश्चय कर गुरु मानिहौँ, औ बंदो तुम पायँ ॥
साहिब कबीर वचन-चौपाई
तुमसों कहौँ जो नाम विचारी । ज्योति नहीं वह पुरुष न नारी ॥ तीन लोक ते भिन्न पसारा । जगमग जोत जहाँ उजियारा ॥ सदा वसंत होत तिहि ठाऊं । संशय रहित अमरपुर गाऊं ॥ तहँवा जाय अटल सो होई । धरमराय आवत फिरि रोई ॥ वरनों लोक सुनो सत भाऊ । जाहि लोकतें हम चलि आऊ ॥ जगमग जोती बहुत सुहावन । दीप अनेक गिने को पावन ॥ जगमग ज्योति सदा उजियारा । करी अनेक गिने को पारा ॥
छंद
जहँ ज्योति जगमग अति सुहावन तत्त्व वारिध अति चलै । कहत दोई कुल तिमिर मनो पन्न झलहल हलै ॥ फेन उडगन बहन लागे शसि मनोहर हेरि को । किमि देउँ पटतर बूझ देखो भाव नहिँ वहाँ जोर को ॥ सोरठा-शोभा अगम अपार, वर्णत बनेँ न एक मुख । कही न जात विसतार, जो मुख होवै पदम सत ॥