कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंतोषबोध
( १६५ )
सब विस्तार कूर्मही दयऊ । तबही पुरुष कन्याको कियऊ॥ रचना रही कूर्मके पेटा । धर्मराय ताघर नहिं दीठा ॥
साखी--रचना रही कूर्ममें, पुरुषहि दीन सर्वांरि । जाते शब्द उत्पति भई, सो मैं कहूँ विचारि ॥
चौपाई
धर्मराय सेवा सितधारा । तब पुरुष ताहि बाचा हारा ॥ पुरुष दीन उत्पति धर्मराई । धायके लडे कूर्मसे जाई ॥
साखी--क्षीणै माथा नख करी, हरे सबे विस्तार । महाशून्य लेय आयऊ, धर्मराय बरियार ॥
चौपाई
निकसी खान वेद रस बानी । चांद सूर्य यों उडगण जानी॥ सब विस्तार निकसिजब आया । धर्म जलनिधि राख छिपाया॥
साखी--निकसी वस्तु कूर्मते, ना कोइ कीन विचार । मूल बीज जब पाइया, भयाकाल बरिआर ॥
धर्मदास उवाच चौपाई
को ले शीश कूर्म का छीना । यह तो भेद सकल हम चीना॥ धर्मराय कन्या कैसे पाई । तीन देव कैसे उपजाई ॥
सद्गुरु वचन
अद्या पुरुष दीन पठवाई । आदि भवानी अमृत लाई ॥ अष्टांगी देखी धर्मराई । तासु सुरति संयोग बनाई ॥ अद्याके विधि शिवसो सुरारी । मथि जलनिधि रतन निकारी॥ अष्टांगीते भये विस्तारा । सब रचना या कीन हमारा ॥
कूर्म वर्णन
बिनती कूर्म पुरुषते लाई । तव सुत शीश हमार छिनाई ॥ छोछा उदर भया हमारा । अहो पुरुष कहु देहु अहारा ॥