कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंतोषबोध
( १६९ )
स्वाती पवन छुवन नहीं पावे । बिन्दु अकेला जो उठि धावे ॥ ताते शून्य होय पुनि जाई । कहूँ भेद चित्तराखु समाई ॥ पवन भेद हम तुमसो कहेऊ । नाम न्यारा इन्ते रहेऊ ॥
साखी-पवन भेद हम भाखेऊ, तामैं कालपसार ।
पचासी पवनके बाहिरे, अरज शब्द है सार ॥
धर्मदास उवाच-चौपाई
पवन भेद सतगुरु हम जाना । अब कछु कहिये नाम बखाना ॥ निःअक्षरका कहो प्रकाशा । है भीतर कि बाहर बासा ॥ कैसे हंसा लोक समाई । कौन बस्तु जो होय सहाई ॥ कैप्रमान बस्तु जो होई । साहेब मोहि कहो तुम सोई ॥
सद्गुरु उवाच
धर्मदास मैं भेद बताऊँ । संशय तेरो सबहि मिटाऊँ ॥ बावन अक्षर मय संसारा । निःअक्षरसो लोक पसारा ॥ सोइ नाम है अक्षर निवासा । कायाते बाहर प्रकाशा ॥ नाम भेद मैं तुमसे कहेऊ । धर्मदास तुम निजकर ठहेऊ ॥ तौन नाम मुनि हंसा पावे । कहै कबीर सो लोक सिधावे ॥
साखी-धरनि अकाशके बाहिरे; योजन आठ परमान ।
तहां क्षत्रतन राखेऊ हंसा करे विश्राम ॥
चौपाई
विन सतगुरु कोई भेद न पाई । धर्मदास मैं तोहि लखाई ॥ राई भर है वस्तु हमारी । अर्धराय स्थूल सवाँरी ॥ लहर लहर बादलमें होई । पुरुष मूल निज जानो सोई ॥ उनको सौप दीन शिर भारा । वै जीवनको करै उबारा ॥ भाषू शब्द प्रथमहैं राई । फूटि अकाश घोर होय जाई ॥ वाहिवक्त जो तजै शरीरा । आवै लोक अस कहै कबीरा ॥