कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकायापांजी
( १७५ )
सदगुरु उवाच
दहिने घाट चन्द्रका वासा । बाँवें सूर करै प्रकाशा ॥ यही दोउ स्वर साधो भाई । चन्द्रद्वार होय निकसो आई ॥ अगम पंथ दहिने स्वर करहु । सुरती संयोगनाल चित धरहु ॥ चन्द्रद्वार होय आओ जाइ । शब्द सुरतिमें रहो समाई ॥ स्वर दाहिने सुरति चढ़ाओ । तबही डोर शब्दकी पायो ॥ शब्द डोर दहिने दिशि जाई । धर्मदास तुम गहो बनाई ॥ पाओ डोर शब्दको भाई । अगम पंथ चढ़ि बैठो जाई ॥ गहो बनाइ कटै यम पासी । पहुँचो लोक मिटै चौरासी ॥ स्वर दाहिने होय करे पयाना । तब सोहं सुरतिहोय अगु आना ॥
सार्वी--कहैं कबीर धर्मदाससे, ऐसा साधो घाट । आगे भेद बताऊं, तहं देखो लिजवाट ॥
चौपाई
अहो धर्मदास मैं भेद बताऊं । शब्दहि सुरतिका द्वार चिह्नाऊं ॥ भाष्यो शब्द सुरतिका पासा । सो मैं तुमसे कहों प्रकाशा ॥ कहूँ तत्त्व तहैं करो जो बासा । मथो तत्त्व तुम धर्मदासा ॥ मथो तत्त्व सुरति सो भाई । पुनि आगेको देहु रंगाई ॥ तत्त्व मथो तुम अंश हमारा । तत्त्वसे उतरो भवजल पारा ॥
धर्मदास उवाच
कह्यो तत्त्व तुम मथो बनाई । ज्ञानी तुमहि कहो समझाई ॥ कहवा आहि तत्त्व को बासा । सो ज्ञानी मोहि कहो प्रकाशा ॥
सतगुरु बचन
दहिनस्वर साधि चढ़ो आकाशा । त्रिकुटी मध्य तत्त्वका वासा ॥ त्रिकुटीमध्य तत्त्व जो रहाई । तहाँ सुरति सो देखो जाई ॥ त्रिकुटी मध्य तत्त्वको थाना तेहि मथि आगे देहु पयाना ॥