कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकायापांजी
( १७९ )
अस उजियार तेहि कमलमें होई। ताका मरम न जाने कोई ॥ अरिष्ट कमल है भेद निनारा। देखों जाई सकल उजियारा ॥ वोहि ठेकान सुरति करू ध्याना। तहां गुप्त होय जाय समाना ॥ एह समान जो बैठे जाई। हो धर्मनि तोहि देउ लखाई ॥ अकह कमल तहां प्रकाशा। ताहि सँहै निःअक्षरका वासा ॥ दुइ कमल मुखही मुख जोरा। तेहिमा शब्द करै घनचोरा ॥ गुप्त नाम गुञ्जार तहाँ देख्यो। मूलशब्दकी जड़ पेख्यो ॥ गुंजार अकह कमलमें आवे। मूलशब्द झंकार सुनावे ॥ मोतीवरण होय उजियाग। फूही छूटे अगरकी धारा ॥ छूटत अगर धार तहाँ भारी। सभै बिलोय मैं कहों विचारी ॥ सुरति संजोय तहाँ पिवै अघाई। जाते तप्त दूर होय भाई ॥ अकह कमलमें करो पैठारा। पीबो जाय अगरकी धारा ॥ झमकत अगर तहां निज मूला। उनसम तुल्य नहीं कोइ तूला ॥ यहि निज जपु अजपा जापा। पहुँचो लोक मिटै संतापा ॥ बरषे तहां अगरकी धारा। सुरतिनाल तहां करो अहारा ॥ जीवतही तहां रहो समाई। यह निज दीन्हों वस्तु लखाई ॥
साखी—कहै कबीर धर्मदाससे, यही वस्तु निजसार ।
यही वस्तु जो जानिये, उतरे भवजल पार ॥
इति श्रीग्रन्थ कायापांजी सम्पूर्ण