भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पञ्चमुद्रा

( १८३ )

अगोचरीको अब कहो निवासा । तासों कीजे योग प्रकाशा ॥ सुर्तनदी तहां उठे तरङ्गा । झालर भेरी शंख मृदंगा ॥ किकिन चिचिन किगरी बैना । गरजनशान धुनधुन सुवसेना ॥ शून्य महलमों बैठे जाई । दशोंद्वार तब वन्द कराई ॥ यह विध ध्यान गगनमों करई । सत्तर बाजा तब सुनु परई ॥ अनहद नाद सुने जो प्राणी । उपजे महासुखके खानी ॥ सतगुरु कहै सांच सोई योगी । तहां मरण मगन रमावत भोगी ॥ अगोचरी मुद्रा कहा प्रकाशा । ताको योग युक्तकी आशा ॥ उनमुनि मुद्रा महद अकाशा । अलखपुर्ष तहां कीन्हों वासा ॥ ब्रह्मप्रकाश तहांअण्ड न पिण्डा । लोकालोक नहीं ब्रह्मण्डा ॥ ब्रण अब्रण जात नहीं पाती । नहींतहां दिवस नहीं तहांराती ॥ तामों सरवर गहिर गँभीरा । जाके आदि अन्त नहीं तीरा ॥ ज्ञानी योगी जप तहां लागा । भयोअनन्द सकलो भ्रम भागा ॥ तामो लीन रहै जो कोई । गुप्त मनोरथ पावै सोई ॥ योग जीत कहो भेद अपारा । बिरला साधू करे विचारा ॥ खेचरी चाचरी भोचरी जानी । अगोचरा उनमुनिकही बखानी ॥ उनमुनि लागी योगपर निद्रा । सुख समाजजहांपरम अनन्दा ॥ यह प्रकाश उनमुनिमों कहिये । कछुक भेद पुनि तामों लहिये ॥ पञ्च मुद्रा और पञ्च अकाशा । पंच ध्यान और पञ्च प्रकाशा ॥ पञ्च वर्ण और पञ्च हैं वेदा । पञ्च तत्त्वके पञ्च हैं भेदा ॥ पञ्च मन्दिर औ पञ्च हैं द्वारा । पञ्च रूप औ पञ्च अहारा ॥ पञ्च इन्द्री औ पञ्च हैं स्वादा । पञ्च विद्या औ पञ्च हैं नादा ॥ पञ्च हैं आसन पञ्च हैं योगी । पञ्च मंदिर औ पञ्च हैं भोगी ॥ पञ्च सत्त औ पञ्च हैं सीउ । पञ्च कर्म औ पञ्च हैं जीउ ॥ पञ्च पृथ्वी औ पञ्च हैं नीरा । पञ्च तेज औ पञ्च समीरा ॥