कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमुद्रा
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वेदनके अस्थान बताई । अब इंद्रिनके स्वाद लखाई ॥ लिंग इंद्री कामिन सो नेही । जिह्वा षट् श्वाद तो लेही ॥ नासा गंध सुगंध अघाई । चक्षु इंद्री रूप लोभाई ॥ श्रवण स्वाद मधुर धुन बानी । ये पांचोंके स्वाद बखानी ॥ पृथी अस्थूल ऋग्वेदकी बानी । नीर अस्थूल जजुर पहिचानी ॥ वायु अस्थूल साम सुतिं कहिये । तेज अस्थूल अथरवण लहिये ॥ अनहद अस्थूल सोहंगकी बानी । सुसम देवताको पहिचानी ॥ खोजे ताहि मुक्त तब होई । सुसम वेद सम और न कोई ॥ वेद अस्थूल कहा समझाई । आसन योगी भेद बताई ॥ पृथ्वीरूप जहाँ आसन जाना । जीवरूप योगी पहिचाना ॥ पानीरूप जहाँ आसन कहिये । हंसरूप योगी तहाँ लहिये ॥ तेजरूप जहाँ आसन जानी । चेतनरूप योगी पहिचानी ॥ बांयेरूप है आसन जहिया । निराकार योगी है तहिया ॥ आकाश रूप आसन प्रवाना । निरंजन योगी जहाँ बखाना ॥ आवागम अब भेद बताई । तुमसो सुकृत नाहिं डुराई ॥ जीव पृथी मिल आवे जाई । मिल पृथी पुनि बहुरि सिधाई ॥ हंस रूप जल मिलके आवै । बहुर नीर मिल घरहि सिधावै ॥ चैतन तेज मिल आवै सोई । बहुर तेज मिल तहाँ सगोई ॥ निरालंब बाये मिलि आवै । बहुर बाये मिल गृहे समावै ॥ निरञ्जन मिल आकाशको आवै । बहुर गगन मिल उलट समावै ॥ आवागम मैं दीन बताई । जन पहुँचनको भेद लखाई ॥ प्रथम पृथीको जल उपजावै । सो जल बहुर पृथीको खादे ॥ जलकी उत्पत्त तेज सो होई । भक्षे तेज पुन जलको सोई ॥ तेजको बाये रूप उपजावै । उलट वाये पुन ताको खावै ॥ बाँये रूप अकाश उपजाई । फिर अकाश पुन ताको खाई ॥ आकाश शून्यते उत्पत्त जानौ । बहुरि शून्यमें जाय समानौ ॥