कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1341, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमुद्रा
( १९१ )
नवै कमल आदको जानो । जाते निरगुण पुर्ष बखानो ॥ एकइस हजार छैसे जाप कहिये । सो सब पुर्ष ध्यानमें लहिये ॥ अष्ट कमलको भेद बताई । और ज्ञान अब भाषो भाई ॥ स्वासाको प्रमाण अब भाषो । तेहि प्रभाव प्रकटकर राखों ॥ अब स्वासाको भेद बताऊँ । जाको मर्म कोई नहीं पाऊँ ॥ अमी अखण्डते वर्ष धारा । तहाँते स्वास होय गुंजारा ॥ निसवासरको जाने मूला । स्वासा सार शब्दसमूला ॥ दशयै घरते स्वासा आवै । कछु नाभी कछु अलख चढ़ावै ॥ निस दिन चले स्वासाकी धारा । सातसे आगर साठि हजारा ॥ अमी कमल अमान सो नाला । अढ़ाई दल पखुरी रिसाला ॥ तहाँते चले पवनकी धारा । स्वासा माहे शब्द गुजारा ॥ उनचालिस हजार एकसे आवै । एतिक चिकुर द्वारसो धावै ॥ ह्दे कमल होय स्वासा आवै । एकइस हजार और छैसे धावै ॥ एता जाप तहाँ प्रवाना । एकइस हजार और छैसे जाना ॥ एतिक स्वासा ह्दे ले आवै । क्षिन बाहिर क्षिन भीतर धावै ॥ दुसरा कमल है झिलमिल माही । झलके जोत अधर धुन ताही ॥ सहस्र पखुरी कमल अन्ना । तहाँ बसे मन जीत सरूपा ॥ ताहे कमल पर बाजा बाजै । सत्तर बाजा तहाँ विराजै ॥ तहाँ घरनी घरियार बजावे । घरी घरी टंकोरा लावै ॥ छैसे औ पचहत्तर स्वासा । एतिक एक घरी प्रकाशा ॥ एतिक स्वासा कमत युगमाही । तब घरनी घरियार बजाही ॥ या विधि चार टँकोरा ठोकै । राहु केतु संग ब्यालि न रोकै ॥ पहर एक करे धुन पूरा । गृहण गिरासे शशि औ सूरा ॥ गहन गिरा सत निसरे स्वासा । रवि शशि राहु केतु प्रकाशा ॥ तेहि संग एक सापनी रहई । घरीघरी वह जीवको गहई ॥ श्वासा सोरह ग्रहण लगावै । छटे मास तेहि काल सतावै ॥