भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पञ्चसुदृढा

( १९७ )

सुक्ति वचन-चौपाई

सुक्ति कह सुन सत्यगुरु ज्ञानी । अगम कथा कहीं अन्तरयार्मी ॥ और कथा अब मोसों भाषों । जो पूछों सो गीय न राषों ॥ हंस अवधको भेद बतावो । तास मर्म सब मोहि सुनावो ॥ आगम वरष मासषट जानो । तो कछु अपने निजमत ठानो ॥ ताको भेद कहों समुझाई । सो मोहि सतगुरु भेद लखाई ॥

योगजीत वचन

सुक्ति सुनो सत् मम वानी । भिन्न भिन्न मैं कहों बखानी ॥ पाचघरी बांये सुर पाई । सोई दहिनो श्वासा चलाई ॥ दशश्वासा सुखमन जो कहिये । ताको भेद बराबर लहिये ॥ आठ पहर पिंगला सुर हालै । बरष तीसरे हंसा चालै ॥ आठ दिवस दहिनो सुर बहै । हंसा अवध वर्ष दोय रहै ॥ सोरह दिन पिंगला सुर बोले । वर्ष एक मो हंसा डोलै ॥ वीस रैयन दिन दहिनो पाई । तब षट मासमें हंस चलाई ॥ एकति सरोज दक्षस्वरको जानो । तब दोय दिनमें हंस पयानो ॥ पांचघरी सुखमन जो हालै । पांचघरी मो हंसा चालै ॥ चन्द सूर सुषमन छपजाई । सुखसे तीजो पवन चलाई ॥ ऐसी विधि पवन चलाई । पहर माहिं हंसा चल जाई ॥

साखी-धूम मंडल दीखे नहीं, जोत न नेत्र लखाय । छठे मास हंसा चले, बचै न कोट उपाय ॥ छाया शीस दीखे नहीं, भुजा शिखर ना दिखाय । दीप बास आवै नहीं, छठे मास चल जाय ॥ गगन शब्द गरजे नहीं, नेत्र गुञ्ज छपजाय । मास एकके अवधमें, हंसा तन तज जाय ॥ भैवरगुफा तिल ना लखे, पुतरी जब चढ़जाय । पहर एकमें जानिये, हंसा तन तज जाय ॥