भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1354

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बोधसागर

ताको उग्रलोक है भाई । तहां अंकूर उदित रहाई ॥ अंकूरलोकते आगे जाना । इक्ष नाम तहां पुर्ष बखाना ॥ चार असंख योजन प्रमानी । इक्ष्या पुर्ष तहां रजधानी ॥ सोई पुर्ष कर्ता होयं आवा । आदपुर्षके अंश कहावा ॥ प्रथम पुर्षकी इक्ष्या आई । ताते इक्ष्या नाम कहाई ॥ ताहि पुर्षको कहां ठिकाना । है सुकित तुम सत्तही माना ॥ इक्ष्या आगे लोक बखानो । सोतो अंश पुर्षको जानो ॥ नौ नील एक संख बखाना । बानी नाम पुर्ष स्थाना ॥ पुर्ष प्रथम बानी उच्चार । ताते नाम सर्व आकारा ॥ ताहि पुर्षको भेद बताई । एतो आद पुर्ष हैं भाई ॥ बानी नामते आगे जाना । सहजनाम तहां पुर्ष बखाना ॥ दशलाख एकशंख बखाना । सहज पुर्षको तहां अस्थाना ॥ तहवां सहज पुर्ष है भाई । आदिपुर्षके अंश कहाई ॥ सातपुर्ष इहांलग जाना । निरंजन अक्षर नीचे थाना ॥ अचितसौ अक्षर उपजे भाई । निरंजन अंश अक्षरते आई ॥

साखी-निरंजन और सहजलों, नौ पुर्ष प्रमान । आदिपुर्ष आगे कहां, जितने सब उत्पान ॥

सहज अंशलग जैतिक भाषा । सो रचना परलयतर राषा ॥ इहांलग प्रलैको प्रमाना । आगे अक्षैलोक अस्थाना ॥ सहज पुर्षते आगे जाई । आदिपुर्षको लोक दिखाई ॥ सहजते एक असंख प्रवाना । तहवां आदिपुर्ष निरबाना ॥ तहँवा प्रलैकालकी छाया । नहीं तहां कछु मोह और माया ॥ तहां न तीनों गुनका भेषा । ब्रह्मा विष्णु तहां न महेशा ॥ नहीं तहां जोत निरंजन राई । अक्षर अचित तहां नहि जाई ॥ तहां नहीं शिवशक्ती औतारा । नहीं तहां अक्षर ओकारा ॥