भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पञ्चमुद्रा

( २१३ )

चरन परवार चरनारज लीजै । बहुत भांतसो भोजन दीजै ॥ महाप्रसाद तासुको लीजै । पीछे औपुन पूजा कीजै ॥ प्रथम बंदगी कायक जाना । मायक बायक फिर पहिचाना ॥ तीनों बंदगी करे बनाई । अनेक भांतिसो ताहे रिझाई ॥ द्रव्य देनको लोभ न कीजै । चरन तरे ताहि धरदीजै ॥ अष्टधातको काया जाना । सो उद्धार कैसे पहिचाना ॥ काया भार उतारके लीजै । चउदह रतन तब गुरुको दीजै ॥ आरती करे बहुभांत बनाई । काया भार तब ताको जाई ॥ यहविध भक्त करो चितलाई । यमको डंड छूट तब जाई ॥

साखी—आरती कीजै पुष्पको, बहुत दीनता लाय ।

कागाते हँसा भयो, सत्त भक्तको पाय ॥

इतनी प्रीत संत जब जाना । तबे संतसो निज मत ठाना ॥ क्रिया करै तबहीमुख बोलै । तबे संत दिल पर्दा खोलै ॥ तबे बस्तु निज देहि लखाई । तासो हंस समाध लगाई ॥ सोई करनी कछुदिन करई । आदिब्रह्म अंतर लख परई ॥ पुर्णलोकमें रहे समाई । तबही बुंद सिंध मिलजाई ॥ इतना खोज करे पुन जबही । अजर अमर घर पावे तबही ॥ निरगुण संतको भेद बतायो । निजमत खोलमें तुम्हैं लखायो ॥ अब एक आगम तुमसों भाषों । सुकृत गोय कछू नहिं राषों ॥

साखी—निरगुणको औतार है, सो प्रकटे जग आय ।

ऋषिमुनि ताको ना लखे, गुप्तसो रहो छिपाय ॥

ताको भेद अब देहुँ बताई । संत रूपसौ जगमें आई ॥ बालक होय पुन जगमें आवै । कमलपत्र पर आसन लावै ॥ निरूनाम जुलहा कहाई । भक्तेहत ताके गृह जाई ॥ खान पान कछु करि हैं नाहीं । दिनदिन अंग बढ़त पुन जाहीं ॥