भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 137

अनुरागसागर

( १ )

शिवनवशीकरण

इन्दी दुष्ट महा अपराधी । कुटिलकाम होई विरलेसाधी ॥ कामिनि रूप कालकी खानी । तजहु तासु सँग हो गुरुज्ञानी ॥

कामवशीकरण

जबही काम उमंग तन आवै । ताहि समय जो आप जुगावै ॥ शब्द विदेह सुरत लै राखै । गहिन मन मौन नामरसचाखै ॥ जब निहतत्त्वमें जाय समाई । तबहीं काम रहै सुरझाई ॥

कामदेव लुटेरा है । छन्द

काम परबल अति भयंकर, महा दारुण काल हो ॥ सुरदेव मुनिगणयक्षगंधर्व, सबहि कीन्ह विलास हो ॥ सबहि लूटे विरल छूटे, ज्ञान गुण निज हट गहे ॥ गुरुज्ञान दीप समीप सतगुरु, भेदमारग तिन लहे ॥ ७ ॥

कामलुटेरेसे वचने का उपाय

सोरठा-दीपक ज्ञान प्रकाश, भवन उजैरा करि रहौ ॥ सतगुरुशब्द विलास, भाज चोर अँजोरा जब ॥ ७ ॥

अनलपक्षिका दृष्टान्त

गुरु कृपासों साधु कहावै । अनलपच्छ है लोक सिधावै ॥ धर्मदास यह परखो बानी । अनलपच्छ गम कहाँ बखानी ॥ अनलपच्छ जो रहै अकाशा । निशि दिन रहै पवनकी आशा ॥ दृष्टिभाव तिनरति विधिठानी । यह विधिगरभ रहेतिहिजानी ॥ अंडप्रकाश कीन्ह पुनि तहवां । निराधार आलंबहि जहवां ॥ मारग माहिं पुष्टु भो अंडा । मारग माहिं त्रिरह नौखण्डा ॥ मारग माहिं चक्षु तिन पावा । मारग माहिं पंख पर भावा ॥ महिद्विग आवा सुधि भइताहीं । इहां मोर आश्रम नहिं आहीं ॥ सुरति सम्हार चले पुनि तहवां । मात पिताको आश्रम जहवां ॥