कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमुद्रा
( २२३ )
राजाराव मिलनको जाई । देखत ताहि सभा भहराई ॥ हाथ जोर आगे चलआई । बहुत भांति तेहि सेवा लाई ॥ कार्य सिद्ध तब जगमों जानो । चर अरु अचर जेते पहिचानो ॥ योग सिद्धके साधन कीजै । यह मत सुरत देख जब लीजै ॥
साखी—सर्व अर्थ मन कामना, आनन्द सकल हुलास ।
जेते सुख है जगतमों, सो सब ताके पास ॥
चौपाई
व्याल लगन अब कहौ विचारी । सोतो युद्धकार्यको भारी ॥ दहिनों सुर पुन आवै जबही । व्याल लगन कहावै तबही ॥ सो सो जाय लाखको मारै । सो संश्राम न कबहुँ हारै ॥ यम स्वरूप जब कटक दिखाई । देय शत्रु तब तुरत पराई ॥ याको दृष्टि भरि हेरे जबही । मानों काल गिरासे तबही ॥ मानों काल लीन्ह औतारा । या विधि ताको रूप निहारा ॥
साखी—व्याल लगनको भेद यह, तुमसों कहां विचार ।
सिद्धिकार्य यामें नहीं, युद्ध जीत अहंकार ॥
जैसुन जगपत केतुकी, औ व्यालिन पहिचान ।
अर्थ सहित गुण लगनको, तुमसों कहां बखान ॥
कोटि योगको योग है; कोटि ज्ञानको ज्ञान ।
कोटिसिद्धको सिद्ध है, कोटि ध्यानको ध्यान ॥
नौ षट चार अष्टदश, तैंतिस कोटि बखान ।
ताते मत आगे कहौं, महारूप विज्ञान ॥
योग ध्यान आक्षेप मत, आदि नाम ले जोय ।
उलट समानों आपमों, जीवन मुक्ता होय ॥
चार मुक्तके बीचमें, रहे अवध परमान ।
याते रहित बखानिये फिर नहीं आवाजान ॥