भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १० )

बोधसागर

कर्म अरु भर्म सब संसार करत है, पीवकी परख कोइ संत जाने। सुरति अरु निरतिमन पवन कूँपलटिकरि, गंग अरु यमुन के घाट आने॥ पाँचको नाथ करि साथ सोहँ लिया, अघर दगि आवका सुख माने। कहैं कबीर सोइ संत निर्भय रहै, जन्म अरु मरणका भर्म माने ॥ नाभि कस्तूरिका मृग बारे फिरै, उलटि करि आपमें नाहिं जोवे। भर्मता भर्मता योनि पूरी करै, अंधयो आपुनी वस्तु खोवै ॥ नाभि निज नामसो ठाम पावै नहीं, जगत सब तीर्थ गर्भ भूला। कहैं कबीर हरिपंथको नाल है, अंध भवसिन्धुमें फिरत झूला॥ उलटि बज्रदमें भर्मना दूरि करि, बाछिकै भटकनै सिद्धि नाही। फिरत बाहरे तहाँ वस्तुको नास है, वस्तु विचारि तू देख माहीं॥ आपमें आप है आप अजपा जपो, जाप जपेते आप पावै। कहैं कबीर ये सत्यकी सैन है, सत्का शब्द सब संत गावै ॥ गंगा उलटि धरो यमुन बासा करो, पलटि पञ्चतीर्थी पाप जावे। फूरि वर्षा तहाँ रैन दिन झरत है, न्हायसो फारि भौ नाहिं आवे॥ फिरत वारे तहाँ बुद्धिको नाश है, बाँझके भटकने सिद्धि नाही। कहैं कबीर इस युक्तिको गहेगा, जनम अरु मरण तव अंत पाहीं ॥ बपु बालोतरा माहि वावो रहै, ज्ञान प्रकाश बिन रहै नाही। बोलता चालता खावता पीवता, करै उपदेश अरु रहै माहीं ॥ दृष्टि दीसै तिनको रहन पावे नहीं, बपु बालोतरो बिनसि जावै। कहैं कबीर एक बोलता सही करें, सो जन्म अरु मरण मैं नाहिं आवै॥ देख बज्रदमें अजब विश्राम है, होय मौजूद तो सही पावै। फेरि मन पवनको घेरि उलटा चले, पाँच पचीसको पलटि लावै ॥ शब्दकी डोरि सुख सिन्धुका झूलना, घोरकी शोर तहँ नाद गावै। नीर विनुकमल तहँ देख अति फूलिया, कहै कबीर मन भँवरछावे॥ रामकी दयाते खेल प्रकट हुआ, तासुका खेल कहो कौन जानै।