भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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आत्मबोध

( १५ )

वस्तुमें वस्तुअरु तत्त्वमें तत्त्व मिलै, जीवका नामयो जायहैं रे॥ जन्म अरु मरनकी शंक नाही कछु, जन्म अरुमरनको पाइहैरे॥ कहैं कबीर यों संत निर्भय हुआ, बहुरि संसार नहिं आइहैं रे ॥ धेनु व्यावैतिको दूध भरवे नहीं, बाँझडी धेनुको दूध होई । बाँझडी धेनुको दूध पीवैतिको, होय सुख रूप ना मरै कोई ॥ बाँझडी धेनुको पुत्र पैदा हुआ, मरि मन मृगको माँस खावै । कहैं कबीर सो पुत्र हैं पाँगुला, चढ़ै आकाश फिर नाहिं आवै॥ ससुन्द उलटा तबै सीपमाहीं मिला, हुआ मोती तहां सीपमाहीं । जल बिनाहंसतहांसदामोती चुगै, ताहंसको कालकी चोट नाही॥ नदी उलटी तबै ससुन्द माहीं मिली, प्राण हंसा तहां सदा झूलै । कहैं कबीर कोइ भेद बिरला लहै, बिना जल केतकी कमल फूलै॥ नहरी काटि करि उलटि पाछे दर्द, ज्याथुं दरियावका सोटलागि। सदा सुख सिंधुमें माछल्लों झूलता, जन्मअरुमरनका भर्मभागा॥ रोमही रोम रसनीरको पीवता, नीरकी प्यासमें सदा जीवै । कहैं कबीर सुख सिंधु छाड़ै नहीं, खार दरिआवजलनाहिं पीवै॥ सुख सिंधुकेसीरका स्वाद तबपाइ हैं, चाहका चौतरा उठिजावै । बीजके माहिं ज्यों वृक्ष विस्तार है, यों चाहके माँहिसबरोग आवै॥ प्रौढ़ वैरागमें होय आरूढ़ मन, चाहके चौतरे आग दीजै । कहैं कबीर यों होय निर्वासनी, ततसो रत्न होय काज कीजै ॥ सूर प्रकाश तहां रैन कहाँ पाइये, रैनप्रकाश नहिं सूर भासै । ज्ञान प्रकाश अज्ञान कहैं पाइये, होय अज्ञान तहां ज्ञान नासै ॥ काम बलवान तहारांम कहैं पाइये, रमिरहा राम तहां कामनाहीं। कहैं कबीर यह तत्त्वविचार है, समझि बिचारि करि देख माहीं॥ कामकी कोथली मूलमें जलि गई, रामकी कोथली रहै प्यारे । राम विश्राम तहां काम कहाँ पाइये, कामविश्रामतहारांममन्यारे॥

नं. ९ कबीरसागर - २