भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1398, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1398

( २२ )

बोधसागर

मिहरकरमिहरकरमिहरकर महाबली, जीवकूं शरणअब राखतेरी । पिसनपांचप्रबल सोबसि मेरे नहीं, सन महानंतकी सबल फेरी ॥ तरसअब कीजियेसुख मोहिदीजिये, दयाकरिजीवकोराखिलीजै । दासकबीरकी बिन्ती साम्भलौ, देवकरुणा मई दरश दीजै ॥ साईं बारही बार मैं कहतपुकारिके, दरदसों दरसदेओ नाम तेरा । पाचको नाथि करि साथराखौसही, विनादीदार दुखप्रानमेरा ॥ काल अकरालकी चोटजोराबहै, विनानिज देवकहो कौन राखै । दास कबीर यह बीनती करत हैं, बारहीबार रस राम चाखै ॥ तुही तू तुही एकसमरथ धनी, तुम विना और कोइ नाहिं मेरे । काम अरु क्रोधमदलोभ वैरी सबल, रैन दिनजीवको रहैं घेरे ॥ त्राहि पुनि त्राहिमें रैन दिनकर हूँ, मेहरिकरि आपनीशरणलीजै । दासकबीर यह बीनती करत है, देवकरुणा मई नाम दीजै ॥ होय निरपक्ष सबपक्षकूं त्यागकरि, रहै मस्तान गुरुज्ञानमाहीं । शील अरु सांच संतोष हृदयधरै, कपटकरतूतके निकट नाहीं ॥ कपटकरतूति तहाँ रामराजी नहीं, सांचकरतूति सब साधु गावैं । कहैं कबीर यक सांचको ले रहो, वेद कितनैं सब साँच गावैं ॥ जगत् अरु भेषके पक्षमें ना पड़े, रहैनिर्पक्ष सोइ युक्ति योगी । फेरिमनपवनको घेरि पांचोपिसन, प्रेमसुखधामजहांप्राणभोगी ॥ जहाँ आयो तहाँ दुख है बहुघना, पक्षकीलाय सब जीव छीजै । कहैं कबीर कोइ सन्तजन सूरमा, होय निर्पक्ष रस अगम पीजै ॥ राम निर्पक्ष निर्पक्षही साधु है, होय निर्पक्ष निर्पक्षही माहीं । साँचको परसि अरु झूठको त्यागिये, साँचकी पक्षकहुँदागनाहीं ॥ साँच सहजैतिरे झूठमें बह मरे, झूठ प्रपंच सू जगत भाता । कहैं कबीर कोई संतजन जोहरी, छाड़ि प्रपंच निजनामराता ॥ भेषको पहरिकरि भर्म भूलैमती, भेष पहिरे कछु सिद्धि नाहीं ।